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राफेल सौदे का जिन्न दोबारा निकलकर बाहर आ रहा

मूल साफ्टवेयर देने से कंपनी का साफ इंकार

  • सोर्स कोड नहीं मिलने से परेशानी

  • अपने हथियार नहीं जोड़ सकते

  • लागत का बड़ा हिस्सा इसी का है

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः फ्रांसीसी सरकार द्वारा राफेल के थैल्स रडार, मॉड्यूलर डेटा प्रोसेसिंग यूनिट, और स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट का सोर्स कोड भारत को देने से कथित इनकार ने नई दिल्ली के लिए एक गंभीर स्थिति पैदा कर दी है। इस विषय पर सोशल मीडिया पर एक भावनात्मक बहस छिड़ी हुई है कि क्या भारत को इस सौदे के साथ आगे बढ़ना चाहिए।विडंबना यह है कि इस बहस में शामिल कई लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वास्तव में दांव पर क्या लगा है, क्योंकि उन्हें एक लड़ाकू विमान में सॉफ्टवेयर की वास्तविक भूमिका की स्पष्ट समझ नहीं है।

राफेल जैसे आधुनिक लड़ाकू विमान की कुल लागत का लगभग 30-40 प्रतिशत हिस्सा आमतौर पर सॉफ्टवेयर विकास और एकीकरण का होता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि मूल उपकरण निर्माता लड़ाकू विमान के साथ सोर्स कोड नहीं देता है, तो आप 100 फीसद भुगतान करने के बावजूद विमान का केवल 60 फीसद ही प्राप्त कर रहे हैं।

जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ेगी, सॉफ्टवेयर की लागत का प्रतिशत 50 प्रतिशत से भी ऊपर जाने की संभावना है। भविष्य में यह शॉर्टचेंजिंग (कम सामान मिलना) और भी बढ़ जाएगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब कोई देश आधुनिक लड़ाकू विमान खरीदता है, तो उसे बदलती युद्धनीति और हथियार प्रणालियों के अनुसार सॉफ्टवेयर में बदलाव के लिए बार-बार निर्माता के पास जाना पड़ता है।

निर्माता पर निरंतर निर्भरता घातक साबित हो सकती है। उदाहरण के लिए, यदि डसॉल्ट राफेल पर रूसी आर -37एम मिसाइलों के एकीकरण की अनुमति नहीं देता है, तो भारत के पास कोई विकल्प नहीं बचेगा। भारत अपने मिसाइल भी इस सोर्स कोड के बिना इन विमानों के साथ नहीं जोड़ पायेगा।

राफेल के पूरे सोर्स कोड में लाखों लाइनें होंगी। भारतीय वायुसेना के प्रोग्रामर को पूरे कोडबेस से परिचित होने में दशकों लग सकते हैं। वायुसेना को संभवतः पूरे कोड की आवश्यकता भी नहीं है; वह केवल नई मिसाइलों और सेंसरों को फिट करने के लिए निम्नतम स्तर तक पहुंच और युद्ध मानकों को बदलने के लिए उच्चतम स्तर तक पहुंच चाहती है।

असली समस्या यह है कि डसॉल्ट वर्तमान हथियारों के एकीकरण के लिए इंटरफेस देने को तैयार हो सकता है, लेकिन भविष्य की जरूरतों के लिए यह पर्याप्त नहीं होगा। उदाहरण के लिए, भविष्य में यदि वायुसेना राफेल से ड्रोन लॉन्च करना चाहती है या किसी मानवरहित लड़ाकू विमान के साथ मिलकर हथियार चलाना चाहती है, तो उसे अंतर्निहित सोर्स कोड के लिए बहुत अधिक व्यापक प्रोग्रामिंग इंटरफेस की आवश्यकता होगी।