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राफेल विमानों सौदे पर टिकीं दुनिया की नजरें

ए आई समिट में भाग लेने भारत पहुंचे फ्रांस के राष्ट्रपति

  • 35 अरब डॉलर का बहुत बड़ा रक्षा सौदा है

  • मेक इन इंडिया और तकनीकी सहयोग

  • रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक संदर्भ

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों अपनी महत्वपूर्ण भारत यात्रा पर मुंबई पहुँच चुके हैं। उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब भारत और फ्रांस रक्षा क्षेत्र के अब तक के सबसे बड़े और ब्लॉकबस्टर लड़ाकू विमान सौदे को अंतिम रूप देने के बेहद करीब हैं। इस संभावित रक्षा सौदे की गूँज न केवल भारत और फ्रांस, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति में भी सुनाई दे रही है।

जानकारी के अनुसार, भारत 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए लगभग 35 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बना रहा है। यदि यह समझौता सिरे चढ़ता है, तो यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा सौदा होगा। हालांकि, नई दिल्ली के अधिकारियों का कहना है कि कीमत और तकनीकी बारीकियों को लेकर अंतिम दौर की बातचीत अभी भी जारी है। इसी कारण यह संभावना भी बनी हुई है कि राष्ट्रपति मैक्रों की इस यात्रा के दौरान शायद आधिकारिक हस्ताक्षर न हों, लेकिन प्रक्रिया को गति अवश्य मिलेगी।

मंगलवार सुबह मुंबई पहुँचने के बाद, मैक्रों का कार्यक्रम काफी व्यस्त है। मुंबई से रवाना होने के बाद वह  नई दिल्ली में एक वैश्विक एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस यात्रा का स्वागत करते हुए विश्वास जताया कि यह चर्चा विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करेगी और वैश्विक प्रगति में योगदान देगी।

यह सौदा फ्रांसीसी विमान निर्माता कंपनी डसॉल्ट एविएशन के लिए अब तक का सबसे बड़ा निर्यात ऑर्डर साबित हो सकता है। खास बात यह है कि इस सौदे के तहत डसॉल्ट द्वारा भारत में ही विमानों के एक बड़े हिस्से और उनके पुर्जों को असेंबल करने की उम्मीद है। इससे भारत के घरेलू हथियार निर्माण उद्योग और मेक इन इंडिया अभियान को जबरदस्त प्रोत्साहन मिलेगा। इसके अतिरिक्त, इंजन निर्माता कंपनी सफरान ने भी पहली बार भारत में राफेल इंजन बनाने के संकेत दिए हैं।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक है और अपनी वायु सेना की घटती स्क्वाड्रन क्षमता (जो वर्तमान में लक्ष्य से काफी कम है) को सुधारने के लिए बेताब है। दूसरी ओर, यूरोप अपनी रक्षा प्रणालियों को पुनर्जीवित करना चाहता है, विशेषकर ऐसे समय में जब अमेरिकी नीतियों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। फ्रांस और भारत दोनों ही रणनीतिक स्वायत्तता के पक्षधर रहे हैं। मैक्रों के साथ आए प्रतिनिधिमंडल में परमाणु ऊर्जा समूह ईडीएफ और एआई स्टार्टअप मिस्ट्रल के प्रमुख भी शामिल हैं, जो दर्शाता है कि संबंध केवल रक्षा तक सीमित नहीं हैं। भारत और फ्रांस का वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार लगभग 15 अरब यूरो का है, जिसे और विस्तार देने की योजना है।