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मोहल्ले के दादा जैसा आचरण कर रहे डोनाल्ड ट्रंप

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन एक बार फिर विवादों के घेरे में है, और इस बार उस पर अपने ही नागरिकों और अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता के सिद्धांतों का उल्लंघन करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। मिनियापोलिस में यूएस इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट के एजेंटों द्वारा एलेक्स जे. प्रेट्टी की हत्या ने अमेरिका के भीतर एक खतरनाक मिसाल पेश की है।

यह जनवरी महीने में संघीय एजेंटों द्वारा की गई गोलीबारी की पांचवीं घटना है। यह उस कठोर अभियान का हिस्सा है जिसे ट्रंप प्रशासन अवैध प्रवासियों पर कार्रवाई का नाम दे रहा है, लेकिन इसके परिणाम अब खूनी संघर्षों के रूप में सामने आ रहे हैं। मिनियापोलिस की घटना कोई अकेली घटना नहीं है।

जनवरी की शुरुआत में मिनेसोटा में ही एक महिला को निशाना बनाया गया था, और अप्रवासी हिरासत केंद्रों से लगातार मौतों की खबरें आ रही हैं। प्रशासन का रवैया इन घटनाओं के प्रति हमेशा की तरह टाल-मटोल वाला रहा है। व्हाइट हाउस के सलाहकार स्टीफन मिलर ने प्रेट्टी को घरेलू आतंकवादी करार दिया, जबकि संघीय एजेंसियों ने दावा किया कि उनके पास हथियार था।

हालांकि, कानूनी रिकॉर्ड बताते हैं कि प्रेट्टी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था और वह उस हथियार के वैध मालिक थे। चश्मदीदों और फुटेज से स्पष्ट होता है कि उन्होंने एजेंटों को नुकसान पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की थी, बल्कि एजेंटों ने ही उन पर जानलेवा हमला किया। यह कार्रवाई राजनीतिक रूप से भी प्रेरित दिखाई देती है।

मिनेसोटा एक ब्लू स्टेट (डेमोक्रेटिक झुकाव वाला) है। वहाँ के गवर्नर ने इसे संगठित क्रूरता कहा है। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई है कि राज्य के जांचकर्ताओं को अपराध स्थल से दूर रखा गया, जिससे संघीय और राज्य संबंधों में एक गहरी दरार आ गई है। सवाल यह उठता है कि क्या संघीय एजेंटों को राष्ट्रपति की भड़काऊ बयानबाजी से छूट का अहसास हो गया है?

घरेलू स्तर पर उथल-पुथल के बीच, ट्रंप प्रशासन ने अपनी आक्रामकता को अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार भी फैला दिया है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ की गई कार्रवाई और उनकी कथित गिरफ्तारी के प्रयासों ने वैश्विक स्तर पर हड़कंप मचा दिया है। अमेरिका ने लंबे समय से मादुरो को अवैध घोषित करने और वहां सत्ता परिवर्तन की कोशिशें की हैं, लेकिन अब वह सीधे टकराव पर उतर आया है।

मादुरो को नशीले पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद के आरोपों में घेरना अमेरिका की उस पुरानी नीति का हिस्सा है, जहाँ वह लैटिन अमेरिकी देशों में अपनी मर्जी की सरकारें थोपना चाहता है। जिस तरह से अमेरिका ने मादुरो को एक अपराधी की तरह पेश किया है, वह उसकी उस बुली वाली छवि को पुख्ता करता है, जिसका प्रदर्शन वह अपने देश की सड़कों पर प्रवासियों के खिलाफ कर रहा है। ट्रंप के अमेरिका फर्स्ट एजेंडे का सबसे विचित्र और डरावना पहलू ग्रीनलैंड को लेकर उनकी हालिया धमकी है।

पिछले कुछ वर्षों से ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड को खरीदने या उस पर नियंत्रण पाने की इच्छा जताता रहा है, लेकिन अब यह केवल एक इच्छा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक धमकी में बदल गई है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड की स्वायत्त सरकार द्वारा इस प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बावजूद, वाशिंगटन का दबाव जारी है। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि ग्रीनलैंड के विशाल प्राकृतिक संसाधन और उसकी सामरिक स्थिति अमेरिकी सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।

लेकिन एक संप्रभु राष्ट्र के हिस्से को खरीदने या उस पर जबरन कब्जा करने की धमकी देना 21वीं सदी की कूटनीति में एक काला अध्याय है। यह स्पष्ट करता है कि ट्रंप प्रशासन केवल प्रवासियों को ही नहीं, बल्कि उन देशों को भी डरा रहा है जो उनकी विस्तारवादी नीतियों के आड़े आते हैं। अवैध प्रवासन को रोकना किसी भी देश का अधिकार हो सकता है, लेकिन इसे कानून के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए। मिनियापोलिस, शिकागो, लॉस एंजिल्स और न्यूयॉर्क जैसे शहरों में फैल रहे नागरिक विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रमाण हैं कि आम जनता अब राजकीय गुंडागर्दी के खिलाफ खड़ी हो रही है।

एक तरफ अमेरिका के भीतर ब्लू स्टेट्स के खिलाफ संघीय एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है, तो दूसरी तरफ वेनेजुएला और डेनमार्क जैसे देशों की संप्रभुता को चुनौती दी जा रही है। घरेलू हिंसा (जैसे प्रेट्टी की हत्या), मादुरो की गिरफ्तारी का अंतरराष्ट्रीय ड्रामा, और ग्रीनलैंड पर विस्तारवादी नजर—ये तीनों घटनाएं एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यह एक ऐसे प्रशासन की तस्वीर पेश करती हैं जो कानून और मानवाधिकारों से ऊपर खुद को सर्वशक्तिमान मानता है। यदि इस अलोकतांत्रिक आचरण को रोका नहीं गया, तो यह न केवल अमेरिका के संघीय ढांचे को नष्ट कर देगा, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था को भी तहस-नहस कर देगा।