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अपने ही रंग में आगे बढ़ चला अमेरिकी प्रशासन

ट्रंप का 66 संगठनों से बाहर जाने का फैसला

वाशिंगटनः राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने एक बार फिर अलगाववादी विदेश नीति अपनाते हुए वैश्विक मंच पर हड़कंप मचा दिया है। बुधवार, 7 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति ट्रंप ने एक ऐतिहासिक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत संयुक्त राज्य अमेरिका ने कुल 66 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, एजेंसियों और आयोगों से अपना समर्थन वापस लेने और उनकी फंडिंग रोकने का निर्णय लिया है। यह कदम ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत वैश्विक सहयोग से पीछे हटने की उनकी रणनीति का सबसे बड़ा विस्तार माना जा रहा है।

प्रमुख संगठनों से विदाई और कारण इस निर्णय की सबसे बड़ी मार संयुक्त राष्ट्र की उन एजेंसियों पर पड़ी है जो जलवायु परिवर्तन और सामाजिक सुधारों पर केंद्रित हैं। अमेरिका अब संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और 1992 की उस ऐतिहासिक संयुक्त राष्ट्र संधि से बाहर हो गया है, जो वैश्विक जलवायु वार्ताओं और पेरिस जलवायु समझौते का मुख्य आधार है।

ट्रंप प्रशासन ने इन संस्थानों को अनावश्यक, कुप्रबंधित और व्यर्थ करार दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, ये संगठन अमेरिकी करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग कर रहे थे और ऐसी नीतियों को बढ़ावा दे रहे थे जो अमेरिका की राष्ट्रीय संप्रभुता, स्वतंत्रता और सामान्य समृद्धि के लिए खतरा हैं।

भारत-फ्रांस गठबंधन और ‘वोक’ पहल पर प्रहार विशेष रूप से, अमेरिका ने भारत और फ्रांस के नेतृत्व वाले अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन को भी छोड़ दिया है। गौरतलब है कि इस गठबंधन की शुरुआत 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने की थी। प्रशासन का तर्क है कि इनमें से अधिकांश निकाय वोक एजेंडे और विविधता संबंधी पहलों को बढ़ावा दे रहे थे, जो ट्रंप की विचारधारा के विपरीत हैं।

चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और भविष्य की रणनीति हालाँकि, अमेरिका पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय मंच खाली नहीं कर रहा है। ट्रंप प्रशासन अब एक अला-कार्टे (चुनिंदा) दृष्टिकोण अपना रहा है। अमेरिका केवल उन संगठनों में अपना प्रभाव और पैसा निवेश करेगा जहाँ उसका सीधा मुकाबला चीन से है, जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ और अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के इस कदम से वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को भारी नुकसान होगा और मानवीय सहायता से जुड़ी परियोजनाओं पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे। अमेरिका का यह बदलाव पिछली रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक सरकारों की नीतियों से पूरी तरह अलग है, जो संयुक्त राष्ट्र की स्थिरता के लिए अमेरिका को अनिवार्य मानती थीं।