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भारतीय दूतावास ने इसके लिए पैसे भी दिये

ट्रंप से रिश्ता सुधारने में जी जान से जुटी है मोदी सरकार

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान और उसके ठीक बाद अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में भारत का पक्ष मजबूती से रखने के लिए लॉबिंग का सहारा लिया था। अमेरिकी न्याय विभाग के फॉरेन एजेंट रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों से यह खुलासा हुआ है कि भारत ने ट्रंप प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों तक पहुँच बनाने के लिए एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स नामक फर्म को नियुक्त किया था।

विशेष रूप से 10 मई 2025 को, जिस दिन भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम की घोषणा हुई, उस दिन इस फर्म ने व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूसी विल्स, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के रिकी गिल के साथ गहन चर्चा की थी। इन वार्ताओं का मुख्य केंद्र संघर्ष के मीडिया कवरेज को प्रबंधित करना और महत्वपूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाना था।

जेसन मिलर के नेतृत्व वाली इस लॉबिंग फर्म को अप्रैल 2025 में लगभग 1.8 मिलियन डॉलर (करीब 15 करोड़ रुपये) के वार्षिक अनुबंध पर नियुक्त किया गया था। भारतीय दूतावास ने इन खुलासों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इस कदम का जोरदार बचाव किया है। दूतावास का कहना है कि अमेरिका में अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने के लिए लॉबिस्ट और सलाहकारों की सेवाएं लेना एक मानक और स्थानीय प्रक्रिया है।

दूतावास ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के लगभग सभी प्रमुख देश और बड़ी व्यापारिक संस्थाएं अपनी पहुँच बढ़ाने के लिए ऐसी फर्मों की मदद लेती हैं और भारत 1950 के दशक से ही विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में ऐसा करता आ रहा है।

हालांकि, भारत में इस मुद्दे पर राजनीतिक विवाद छिड़ गया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इन दस्तावेजों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने संकेत दिया कि 10 मई 2025 को पर्दे के पीछे काफी कुछ घटित हुआ था, जिसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शाम को ऑपरेशन सिंदूर रोकने की पहली औपचारिक घोषणा की थी।

यह भी सामने आया है कि अगस्त 2025 में भारतीय दूतावास ने मर्करी पब्लिक अफेयर्स नामक एक अन्य फर्म को भी नियुक्त किया था। उस समय अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की संभावना थी, जिसे टालने के लिए भारत ने प्रति माह 75,000 डॉलर के भुगतान पर रणनीतिक संचार सेवाएं ली थीं।

ये खुलासे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के उस गुप्त हिस्से को उजागर करते हैं जहाँ केवल आधिकारिक बयान ही नहीं, बल्कि भारी-भरकम फीस लेकर काम करने वाले लॉबिस्ट भी देशों के भाग्य और उनके संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह दिखाता है कि युद्ध और आर्थिक प्रतिबंधों जैसे संकटपूर्ण समय में रणनीतिक संचार और लॉबिंग किसी भी देश की विदेश नीति का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं।