सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया
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12 साल से अस्पताल के बेड पर है
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जीवन रक्षक प्रणालियों से जिंदा है
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ठीक होने की अब कोई उम्मीद नहीं
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः विस्तर पर पिछले बारह साल से एक लाश की तरह पड़े व्यक्ति के सम्मानजनक मृत्यु के मामले में शीर्ष अदालत ने याचिका पर अपनी सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखा ह । यह मामला एक 32 वर्षीय व्यक्ति की जीवन रक्षक प्रणाली (लाइफ सपोर्ट) हटाने से संबंधित है। यह व्यक्ति पिछले 12 वर्षों से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट यानी एक ऐसी स्थायी अचेतन अवस्था में है जिसे चिकित्सा विज्ञान में अब अपरिवर्तनीय माना जा चुका है। 12 साल पहले एक इमारत से गिरने के कारण वह इस गंभीर स्थिति में पहुँच गया था। इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता (मरीज के पिता) की वकील रश्मि नंदकुमार ने भारत में मरने के अधिकार से संबंधित कानूनी इतिहास का विवरण दिया। उन्होंने ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य, अरुणा शानबाग और अंततः 2018 के ऐतिहासिक कॉमन कॉज फैसले का हवाला दिया। 2018 के फैसले में ही सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने पहली बार माना था कि सम्मान के साथ जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी शामिल है।
अदालत द्वारा गठित दो मेडिकल बोर्डों (प्राथमिक और द्वितीयक) ने पहले ही अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। यदि न्यायालय इस याचिका को स्वीकार करता है, तो यह कॉमन कॉज के दिशा-निर्देशों का न्यायिक रूप से लागू होने वाला भारत का पहला मामला होगा।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि मरीज वर्तमान में ट्रेकियोस्टोमी ट्यूब (सांस लेने के लिए) और गैस्ट्रोस्टोमी (भोजन के लिए पेट में लगी ट्यूब) के सहारे जीवित है। एम्स द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को न्यायमूर्ति पारदीवाला ने बेहद दुखद बताया। उन्होंने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि कोई भी इंसान इस तरह जीवित नहीं रह सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि लंबे समय तक बिस्तर पर रहने के कारण मरीज के शरीर पर बेड सोर हो गए हैं। उनके वकील ने तर्क दिया कि पिछले 13 वर्षों से दिल्ली के इहबास अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है, लेकिन स्थिति में रत्ती भर सुधार नहीं हुआ है। माता-पिता का मानना है कि उनके बेटे के सर्वोत्तम हित में अब चिकित्सकीय सहायता से दी जा रही पोषण और जल आपूर्ति को बंद कर देना चाहिए, ताकि उसे इस अंतहीन पीड़ा से मुक्ति मिल सके।