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मोदी के देश में गांधी के नाम की जरूरत नहीं

महात्मा गांधी और पूज्य बापू के नाम पर चार दिनों तक चले गहन राजनीतिक विवाद के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि नरेंद्र मोदी सरकार ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना मनरेगा से गांधीजी का नाम पूरी तरह हटाने जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा लाए जा रहे नए विधेयक में न महात्मा गांधी का नाम होगा और न ही उन्हें पूज्य बापू के रूप में संबोधित किया जाएगा।

इस नई योजना के केंद्र में अब राम होंगे। विधेयक के अनुसार, रामचंद्र फिलहाल जी राम जी के रूप में विराजमान हैं, जो प्रचार के शोर में जल्द ही जय राम जी का रूप ले सकते हैं। 2005 में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा शुरू की गई इस ऐतिहासिक ग्रामीण रोजगार योजना का नया नाम विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल 2025 रखा गया है।

इसके अंग्रेजी नाम के शुरुआती अक्षरों को जोड़ने पर यह वीबी जी राम जी बनता है। नाम बदलने के साथ-साथ योजना के स्वरूप में भी बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं। नए बिल के तहत काम के दिनों की संख्या 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है। हालांकि, सबसे बड़ा बदलाव इसके वित्तीय ढांचे में है। अब तक मनरेगा का शत-प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार वहन करती थी, लेकिन नए प्रस्ताव के अनुसार, बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों को छोड़कर अन्य राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ाया गया है।

उत्तर-पूर्वी राज्यों, हिमालयी राज्यों और जम्मू-कश्मीर के लिए केंद्र 90 प्रतिशत खर्च देगा, जबकि अन्य सभी राज्यों के लिए केंद्र का योगदान घटाकर 60 प्रतिशत कर दिया गया है। इसका अर्थ है कि गांधीजी का नाम हटाने के साथ-साथ राज्यों पर 40 प्रतिशत अतिरिक्त वित्तीय भार भी डाल दिया गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महात्मा गांधी कभी भी संघ और भाजपा के प्रिय नहीं रहे, बल्कि उनके हत्यारे को ही संघ का संरक्षण मिलता रहा है। सत्ता में आने के बाद मोदी ने गांधीजी को एक वैश्विक रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया। जिस व्यक्ति की मूर्तियां दुनिया के सौ से अधिक देशों में स्थापित हों, उसे अचानक नकारना राजनीतिक भूल होती।

लेकिन अब संभवतः सरकार को लगता है कि उस रणनीति की और आवश्यकता नहीं है। सत्तावादी और आत्ममुग्ध नेतृत्व का चरित्र अक्सर ऐसा ही होता है कि वे अंततः अपनी पहचान को ही सर्वोपरि स्थापित करना चाहते हैं। चर्चा यह भी है कि प्रधानमंत्री शायद रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा दी गई महात्मा की उपाधि को अपने लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं।

गांधीजी के प्रति उनकी अरुचि जगजाहिर है, इसीलिए पहले पूज्य बापू शब्द का प्रयोग किया गया और अब उसे भी हटाकर राम के नाम का सहारा लिया जा रहा है। संसद में जब इस बिल पर चर्चा होगी, तो मोदी को अपने ही पुराने बयान सुनने पड़ेंगे। 2015 में उन्होंने कांग्रेस पर तंज कसते हुए मनरेगा को कांग्रेस की विफलता का जीवित स्मारक कहा था और मजाक उड़ाया था कि आजादी के 60 साल बाद भी लोग गड्ढे खोद रहे हैं।

आज 11 साल के शासन के बाद सरकार को न केवल काम के दिन बढ़ाने पड़ रहे हैं, बल्कि 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन भी देना पड़ रहा है। नोटबंदी और कोविड के दौर में जब मजदूर गांवों की ओर लौटे, तब मनरेगा ही उनके जीने का एकमात्र सहारा बना था। मोदी सरकार की राजनीति हमेशा से चमत्कार और प्रचार पर आधारित रही है।

2014 से 2022 के बीच सरकार ने विज्ञापनों पर लगभग 6,491 करोड़ रुपये खर्च किए। इस प्रचार तंत्र के साथ-साथ नाम बदलने की राजनीति भी बखूबी चल रही है। पिछले 11 वर्षों में दर्जनों ऐसी योजनाएं हैं जो कांग्रेस काल में शुरू हुई थीं, लेकिन मोदी सरकार ने उनका नाम बदलकर उन्हें अपना मौलिक विचार बताकर पेश किया। उदाहरण के तौर पर निर्मल भारत अभियान बन गया स्वच्छ भारत अभियान। नो फ्रिल्स अकाउंट का नाम बदलकर प्रधानमंत्री जन-धन योजना किया गया।

स्वावलंबन योजना अब अटल पेंशन योजना है। नेशनल इ-गवर्नेंस प्लान को डिजिटल इंडिया का नाम दिया गया। इंदिरा आवास योजना और राजीव आवास योजना को मिलाकर प्रधानमंत्री आवास योजना बनाया गया। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना अब दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना है। नेशनल मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी ही आज का मेक इन इंडिया है।

जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन का नाम बदलकर अटल मिशन किया गया। जी राम जी इस लंबी सूची का नवीनतम हिस्सा है। यह स्पष्ट है कि गांधीजी का नाम हटाना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक वैचारिक बदलाव है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि चालाकी से महान कार्य नहीं होते, लेकिन भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर में यह सत्ता में बने रहने का सबसे बड़ा हथियार प्रतीत होता है।