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वरना बच्चा कह देता यह राजा तो नंगा है

समारोह स्थल पर देश-विदेश के जाने-माने मेहमानों के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आत्मविश्वास से भरा ऐलान गूंजता है: भारत में अब खाने की कोई कमी नहीं है। देश में खाने की सप्लाई अब डिमांड से कहीं ज़्यादा है। इस बार भारत दुनिया को खाना एक्सपोर्ट करेगा। यह घोषणा, पिछले साल अगस्त में की गई थी, और सांख्यिकी के आधार पर इसे चुनौती देना मुश्किल था।

वर्ष 2024 तक, भारत दुनिया में दूध, जूट और दालों के उत्पादन में पहले नंबर पर था। दुनिया के कुल कृषि उत्पादन में भारत का योगदान लगभग 7.5 प्रतिशत है। वित्तीय वर्ष 2022-23 में, कृषि निर्यात 53.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया था। इन आँकड़ों ने सरकार को अपनी सफलता का जश्न मनाने और विश्व मंच पर अपनी छवि चमकाने का पूरा अवसर दिया।

हालांकि, उस भव्य सभा में कुछ महत्वपूर्ण और मुश्किल सवाल नहीं पूछे गए, जिसने देश की वास्तविक स्थिति पर एक गहरा संदेह पैदा कर दिया। सवाल यह थे कि देश अनाज में सरप्लस होने के बावजूद ग्लोबल हंगर इंडेक्स में साल दर साल सबसे नीचे क्यों रहता है। बेहतर मेडिकल केयर के बावजूद, हर साल 2.1 प्रतिशत से ज़्यादा नए जन्मे बच्चों की मौत क्यों होती है?

देश के कितने लोगों को दिन में दो बार पौष्टिक भोजन मिल पाता है?  निराशा तब और गहरी हो गई जब वर्ष 2025 के लिए ग्लोबल हंगर इंडेक्स के आँकड़े सामने आए। 127 देशों की सूची में भारत 102वें स्थान पर रहा। यह स्थिति न सिर्फ़ चिंताजनक है, बल्कि यह भी दिखाती है कि हमारे लगभग सभी पड़ोसी देश—बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका—भूख के मामले में भारत से काफी बेहतर स्थिति में हैं।

एक ओर तकनीक जीवन की परिभाषा बदल रही है, तो दूसरी ओर लाखों लोग भुखमरी और कुपोषण की गहरी खाई में जी रहे हैं। अनुमान है कि 2025 में भी, दुनिया में हर दस में से एक व्यक्ति भूखा रहेगा। इस धरती पर लगभग 673 मिलियन लोग पुरानी भूख के शिकार हैं। ग्लोबल हंगर इंडैक्स 2025 दर्शाता है कि सबसे बुरी स्थिति अफ़्रीका और एशिया के देशों की है।

इन देशों में चिंता वाले देश या गंभीर भूख वाले देश शामिल हैं, जिनके स्कोर 31 से 42.6 के बीच हैं। सबसे ज़्यादा भूख वाले शीर्ष दस देशों में सोमालिया (42.6), साउथ सूडान (37.5), डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो (37.5) जैसे देश शामिल हैं। भारत का स्कोर 25.8 है, जो उसे गंभीर भूख की श्रेणी में रखता है। 2024 में भारत 127 देशों में से 105वें स्थान पर था (स्कोर 27.3)। 2025 में 123 देशों में से 102वें स्थान पर है (स्कोर 25.8)।

एक मजबूत कृषि प्रणाली और पर्याप्त खाद्य भंडार होने के बावजूद, भारत का लगातार भूख और कुपोषण में सबसे निचले पायदान वाले देशों के साथ खड़ा होना एक राष्ट्रीय विडंबना है। विशेषज्ञों ने इस असमान गरीबी के पीछे कई कारणों की पहचान की है। खाने का असमान वितरण: उत्पादन होने के बावजूद, ज़रूरतमंदों तक भोजन का पहुँच न पाना।

बच्चों का कुपोषण और मृत्यु दर: खराब स्वच्छता और पोषण की कमी। जनसांख्यिकीय चुनौतियाँ और शासन: अत्यधिक जनसंख्या और लोकतांत्रिक गणराज्य में अलग-अलग प्रांतों के विभिन्न शासन तंत्र, जो खाद्य सुरक्षा श्रृंखला में बड़ी चुनौतियाँ पैदा करते हैं। देश की 14.7 प्रतिशत आबादी कुपोषित है। 35.5 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। 2.1 प्रतिशत बच्चे जन्म के 5 साल के अंदर मर जाते हैं।

बच्चों में स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कम लंबाई) की दर 35.5 प्रतिशत है। 50 साल से कम उम्र की 53 प्रतिशत महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित हैं। यह एक चौंकाने वाला तथ्य है कि देश में पैदा होने वाले अनाज का लगभग 40 प्रतिशत अपर्याप्त स्टोरेज और खराब डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम की कमी के कारण बर्बाद हो जाता है।

यही कारण है कि दुनिया का सबसे बड़ा अनाज उत्पादक और विशाल खाद्य भंडार रखने वाला देश होने के बावजूद, इसके बहुत से नागरिकों को दिन में दो बार का भोजन भी नसीब नहीं होता। अगर देश के लोगों की भूख मिटानी है, तो केवल उत्पादन बढ़ाओ का नारा पर्याप्त नहीं है। यदि अनाज का वितरण उचित और समान नहीं होगा, और उत्पादन का लाभ देश के सभी लोगों तक नहीं पहुँचेगा, तो उत्पादन और भूख के बीच लाखों योजन का अंतर बना रहेगा।

अब जवाबदेही तय करने का समय आ गया है। जनता की निगाहें उन घोषणाओं पर नहीं, बल्कि हंगर इंडेक्स में देश की वास्तविक स्थिति पर टिकी हैं। हो सकता है, किसी दिन किसी सभा में कोई खड़ा होकर आपसे वही सवाल पूछ ले जो सदियों से पूछा जाता रहा है: राजा, आपके कपड़े कहाँ हैं?