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राज्य सरकार ने टाटा से दो सौ करोड़ उधार लिया

आर्थिक मजबूरियों से झारखंड के राजनीतिक समीकरण बदलेंगे

  • अफसरों और कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लाले

  • किसी विभाग के ठेकेदार का भुगतान नहीं हो रहा

  • अपनी गिरफ्तारी का अपमान हीं भूल पाये हैं हेमंत

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः झारखंड की राजनीतिक क्षितिज पर नई रोशनी की झलक दिखने लगी है। बिहार विधानसभा के चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा को स्थान नहीं मिलने के बाद ही इसकी संभावनाएं जन्म लेने लगी थी। अब झारखंड सरकार का अपना आर्थिक ढांचा हर राजनीतिक समीकरण को नये सिरे से सोचने विचारने पर मजबूर हो गया है। यह जगजाहिर बात है कि झारखंड के विधानसभा चुनाव में मइया सम्मान की प्रमुख भूमिका रही।

अब इतने दिनों बाद इसी मइया सम्मान का नियमित भुगतान ही राज्य सरकार के गले की हड्डी बन गया है। आर्थिक तंगी की वजह से पिछले दो महीनों से इसका भुगतान नहीं हो पा रहा है। ऐसे में हेमंत सरकार को केंद्र सरकार पर बहुत अधिक निर्भर होने की मजबूरी आ पड़ी है। इसी वजह से जानकार बताते हैं कि आने वाले दिनों में इस आर्थिक जरूरत की वजह से भी हेमंत सोरेन को नये राजनीतिक समीकरण गढ़ने पर सोचना पड़ सकता है। दिल्ली दरबार के धाकड़ लोग भी इस स्थिति पर पैनी नजर रखकर चल रहे हैं और सही मौके पर मोलभाव फिर से प्रारंभ करने का भी मौका देख रहे हैं।

सरकारी सूत्रों की मानें तो सरकार के पास धन की कमी ऐसी हो गयी है कि अन्य विकास कार्यों के लिए भी अभी धन उपलब्ध नहीं है। सरकारी विभागों में ठेकेदारी करने वालों से भी इस बात की पुष्टि हो जाती है कि उनके भुगतान काफी समय से लंबित हैं क्योंकि विभाग के पास अपना फंड उपलब्ध नहीं है। जानकार बताते हैं कि पिछली बार सरकार को अपने ही अधिकारी और कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लिए भी धन की कमी हो गयी थी। जिसके बाद कुछ समझदार लोगों ने टाटा लीज के भुगतान के एवज में दो सौ करोड़ का अग्रिम लेकर यह काम पूरा किया है। दूसरे शब्दों में अगर टाटा से यह दो सौ करोड़ नहीं मिलते तो सरकारी अफसरों और कर्मचारियों के वेतन का भुगतान भी अधर में लटक जाता।

यही से सवाल उपजता है कि इस परेशानी से मुक्ति का आसान रास्ता केंद्र सरकार के समर्थन का बनता है। इसी वजह से हो सकता है कि आने वाले दिनों में फिर स झामुमो और भाजपा एक दूसरे के करीब आ जाएं। वैसे यह तय है कि इस बारे में अगर कुछ फैसला होता भी है तो इसमें भाजपा के प्रदेश स्तरीय नेताओं की कोई भागीदारी नहीं होगी और सब कुछ सीधे दिल्ली दरबार से ही मैनेज किया जाएगा।

फिलहाल इसमें बड़ा कांटा हेमंत सोरेन का जेल जाना है। इस मामले को हेमंत सोरेन अब तक भूल नहीं पाये हैं कि किस अपमानजनक तरीके से उन्हें ईडी के द्वारा फर्जी मामले में जेल भेजा गया।  उनके विकल्प के तौर पर लाये गये चंपई सोरेन भी भाजपा के परोक्ष दबाव को अधिक दिनों तक झेल नहीं पाये और अंततः भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गये। लिहाजा अब विकास कार्यों के लिए धन की आवश्यकता भी हेमंत सोरेन को अपनी राजनीति जारी रखने के लिए नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर सकती है। वैसी स्थिति में झारखंड में नया राजनीतिक समीकरण देखने को मिल सकता है।