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नेहरू की आलोचना का उत्तर है ममदानी का भाषण

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जोर देकर कहा है कि नेहरू और पटेल दोनों ही जम्मू और कश्मीर के भारतीय संघ में विलय के पक्षधर थे। लेकिन महाराजा हरि सिंह ने इसमें देरी की, और इसी कारण कश्मीर की जटिल समस्या उत्पन्न हुई। सरदार पटेल गृह मंत्री थे। उन्होंने लगभग 560 रियासतों को शांतिपूर्ण ढंग से भारतीय संघ में एकीकृत किया।

सितंबर 1947 के पहले सप्ताह में ही नेहरू को पाकिस्तानी सेना द्वारा कश्मीर पर हमला करने की योजना के बारे में पता चल गया था। जब मेजर कलकट, जो पाकिस्तान से भागकर भारतीय सेना मुख्यालय को पाकिस्तान की योजना की सूचना देने आए थे, उन्हें तीन मूर्ति भवन में नेहरू के सामने लाया गया,

तो नेहरू ने उनकी बात सुनी और फिर मेजर कलकट पर अविश्वास करने के लिए भारतीय सेना के उच्च पदस्थ अधिकारियों को डांटते हुए, अपनी मेज पर पड़े कागज़ों के एक बंडल को हटा दिया और गुस्से में मेजर कलकट के साथ आए सेना अधिकारियों से कहा, इन कागज़ों में खोजो, तुम्हें पाकिस्तान में रची गई साजिश का खुलासा करने वाला एक पत्र मिलेगा।

यह एक तथ्य है कि महाराजा हरि सिंह ने नई दिल्ली को संकेत भेजे थे कि वह भारत में विलय करना चाहते हैं। लेकिन नेहरू ने हर बार मना कर दिया, यह तर्क देते हुए कि जब तक यह अनुरोध शेख अब्दुल्ला की ओर से नहीं आएगा, वह नहीं मानेंगे। यह कैसे हुआ कि नेहरू की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा हवा में गायब हो गई जब, आजादी के सिर्फ पांच साल बाद, शेख ने भारत-समर्थक से स्वतंत्रता-समर्थक विचारधारा की ओर लक्ष्य को बदल दिया?

नेहरू ने उन्हें सीधे नहीं, बल्कि दो प्रतिनिधियों, मौलाना अबुल कलाम आजाद और रफी अहमद किदवई के माध्यम से गिरफ्तार करवा कर अपदस्थ करवा दिया, जबकि वह लंदन में एक भ्रमण पर थे। यह सारा कुछ इतिहास की गलत व्याख्या अथवा तथ्यों के साथ छेड़खानी से होता है। आज के दौर में जब हर रोज व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के खिलाफ जहर परोसा जाता है तो उसे फैलने में देर नहीं लगती।

दूसरी तरफ असली इतिहास को खंगालने के लिए पढ़ने की आवश्यकता है। कश्मीर के प्रसंग पर लौटे तों जब पहली बार महाराजा के सैन्य समर्थन के औपचारिक अनुरोध पर नई दिल्ली में लॉर्ड माउंटबेटन की अध्यक्षता में रक्षा समिति में चर्चा हुई, जिसमें नेहरू, पटेल, ब्रिटिश सेना कमांडर, जनरल करिअप्पा और अन्य उपस्थित थे, तो ब्रिटिश कमांडरों ने श्रीनगर में भारतीय सैनिकों को भेजने के खिलाफ जोरदार बात की।

उन्होंने कनेक्टिविटी, आपूर्ति लाइन, सर्दी, बर्फबारी और अन्य रसद की समस्याओं के बारे में तर्क दिया। एक घंटे तक नेहरू उनके तर्क को खारिज किए बिना सुनते रहे। पटेल यह जानने के लिए इंतजार कर रहे थे कि नेहरू को क्या कहना है। जब उन्होंने पाया कि नेहरू औपनिवेशिक शक्ति के सामने झुक गए हैं और उनका मुकाबला नहीं कर रहे हैं, तो उन्होंने अचानक नेहरू की ओर मुड़कर कहा, जवाहरलाल, क्या आप कश्मीर चाहते हैं या नहीं? हाँ या ना कहो?

नेहरू ने हाँ कहा। तुरंत, पटेल जनरल करिअप्पा (स्वतंत्र भारत के नामित सेना प्रमुख) की ओर मुड़े और कहा, जनरल, सड़क हो या न हो, बर्फ हो या बारिश, मैं चाहता हूँ कि भारतीय सैनिक कल सुबह श्रीनगर में हों। उसी शाम, भारतीय सेना के ब्रिटिश सी-इन-सी जनरल बुचर ने इस्तीफा दे दिया। जनरल करिअप्पा ने कार्यभार संभाला।

उसी रात, सिख लाइट इन्फेंट्री को पटियाला से ले जाया गया और श्रीनगर के दामोदर हवाई अड्डे पर हवाई मार्ग से पहुँचाया गया, जहाँ नागरिक वेश में घुसपैठ करने वाली पाकिस्तानी सेना के साथ पहली मुठभेड़ हुई, और सिख एलआई के मेजर सोमनाथ शर्मा शहीद हुए। मुझे उम्मीद है कि इस जवाब को पढ़ने के बाद, श्री खड़गे और उनकी टीम महाराजा हरि सिंह की भूमिका के इतिहास पर सही दृष्टिकोण से पुनर्विचार करने की कोशिश करेगी।

अंतिम महाराजा ने न केवल जम्मू और कश्मीर के शासक का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि उस संस्थान का भी प्रतिनिधित्व किया जिसने जम्मू और कश्मीर राज्य का निर्माण किया, जिसकी उप-हिमालयी सीमाएँ अब भारतीय गणराज्य की उत्तरी सीमा की रक्षा करती हैं। अब न्यूयार्क के नये मेयर जोहरान ममदानी ने अपने पहले ही विजयी भाषण में नेहरू का उल्लेख कर यह साबित कर दिया है कि देश के भीतर चाहे जितना भी जहर परोसा जाए, वैश्विक स्तर पर इतिहास से छेड़खाना नहीं की जा सकती। हर बार पटेल और नेहरू के बीच एक काल्पनिक प्रतिस्पर्धा तैयार करने से देश के असली मुद्दों का समाधान नहीं हो सकता, इसे तो अब देश के लोगों को समझना है।