वांगचुक नहीं तो हिमालय पर तो विचार हो
देश के प्रमुख पर्यावरण और सामाजिक कार्यकर्ता को केंद्र सरकार ने अचानक ही पाकिस्तानी एजेंट करार दिया। कुछ वर्षों बाद जब यह आरोप गलत प्रमाणित होता तो शायद आरोप लगाने वाले डीजीपी अपनी कुर्सी पर नहीं रहेंगे और लोग भी यह याद नहीं रखेंगे कि इस व्यक्ति ने यह गलत बयान दिया था।
लेकिन मुद्दा यहां सिर्फ सोनम वांगचुक का नहीं बल्कि हिमालय के पर्यावरण का भी है। यह पूरा इलाका अभूतपूर्व पैमाने पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों से जूझ रहा है। जहां आम लोगों के लिए ये केवल विनाशकारी प्राकृतिक आपदाएं हैं, वहीं वैज्ञानिक समुदाय के लिए यह एक जटिल चुनौती है कि इन बढ़ते नुकसानों को प्रभावी ढंग से कैसे कम किया जाए।
इस क्षेत्र में मूसलाधार बारिश और चरम जलवायु घटनाओं में वृद्धि के कारण स्पष्ट हैं कि मुख्य अपराधी मानव गतिविधियों से प्रेरित ग्रीनहाउस गैसों का असंतुलन है। यह असंतुलन हिमालयी पर्यावरण को तेज़ी से गर्म कर रहा है; 4,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान प्रति दशक लगभग आधा डिग्री की दर से बढ़ रहा है।
बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान और मिज़ोरम विश्वविद्यालय के हालिया शोध इस चिंता को रेखांकित करते हैं। पेड़ों के अनुप्रस्थ काट के वलयों के अध्ययन से बीएसआईपी शोधकर्ताओं ने पाया है कि पिछले 500 वर्षों में मानसूनी वर्षा की प्रवृत्ति घट रही है, जबकि चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति बढ़ रही है।
ये परिणाम पूरे हिमालय, विशेष रूप से उत्तराखंड हिमालय के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं। जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा खतरा इस क्षेत्र के हिम आवरण पर मंडरा रहा है। मिज़ोरम विश्वविद्यालय के सुरजीत बनर्जी और उनकी शोध टीम ने 1991 से 2021 तक सुदूर संवेदन तकनीकों का उपयोग करते हुए पाया कि मध्य हिमालय में, वर्ष के घने और पतले, दोनों ही तरह के हिम आवरण में भारी गिरावट का रुझान दिखाई देता है।
पतले हिम आवरण में पहले क्रमिक वृद्धि हुई, लेकिन 2006 के बाद तेज़ी से गिरावट आई, जो इस क्षेत्र की बढ़ते तापमान के प्रति उच्च संवेदनशीलता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। हिमालयी भूभाग अपनी नाज़ुकता के लिए जाना जाता है, जो जलवायु और भूकंपीयता के संयोजन के कारण है। दुर्भाग्य से, मानवीय हस्तक्षेप ही वह मुख्य कारक है जिसने इस क्षेत्र में आपदाओं की तीव्रता को बढ़ाया है।
सड़क चौड़ीकरण और सुरंग निर्माण जैसे कार्य, जो पहले मामूली समझे जाते थे, अब इस पारिस्थितिकी तंत्र को और भी संवेदनशील बना रहे हैं। अब तो डॉ मुरली मनोहर जोशी और करण सिंह जैसे प्रमुख लोगों ने भी इस पर चिंता जतायी है और गनीमत है कि उन्हें अब तक पाकिस्तानी एजेंट नहीं बताया गया है।
उत्तराखंड में जंगल की आग एक आम समस्या है, और इनमें से अधिकांश आगें मानवजनित हैं। इसके कारणों में घास की वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए गिरे हुए चीड़ के पत्तों को जलाना और एक अज्ञानी स्थानीय मान्यता कि लकड़ी जलाने से बारिश होगी, शामिल है। आईआईटी कानपुर और एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के एक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि जंगल की आग से उत्पन्न होने वाले काले कार्बन कण बादलों के नाभिकों को संघनित कर रहे हैं, जिससे इस क्षेत्र में बादल फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
इसके अलावा, ये कण हिमनदों वाले भूभाग में हवा के तापमान को बढ़ाकर हिमनदों के पिघलने की दर को भी बढ़ा रहे हैं। असुरक्षित बस्तियों का विस्थापन: सरकार को उन स्वाभाविक रूप से असुरक्षित क्षेत्रों की तुरंत पहचान करनी चाहिए जहां बस्तियां स्थित हैं। लोगों के साथ मिलकर काम करते हुए उन्हें सुरक्षित क्षेत्रों में पुनर्स्थापित करना तात्कालिक आवश्यकता है।
हिमालय में अवैज्ञानिक सड़क चौड़ीकरण और निर्माण परियोजनाओं को तुरंत रोका जाना चाहिए। इस क्षेत्र को ऐसी लचीली सड़कों की आवश्यकता है जो बड़ी संख्या में भूस्खलन को रोकने में सक्षम हों। पहले से चौड़ी हो चुकी सड़कों के लिए गहन ढलान उपचार आवश्यक है। वरना सिर्फ सरकार की मर्जी का विरोध करने वाले को पाकिस्तानी एजेंट करार देने से इस प्राकृतिक चुनौती का मुकाबला हम नहीं कर सकते।
इस बार की बारिश में भी हमलोगों ने बड़े बड़े पहाड़ों को नीचे गिरते हुए देखा है। जुबानी जमा खर्च से यह चुनौती कभी भी कम नहीं हो सकती। दूसरी तरफ कल तक जो राष्ट्रप्रेमी था वह रातोंरात पाकिस्तानी एजेंट इसलिए बन गया क्योंकि उसने सरकार का विरोध किया था। या फिर सोनम वांगचुक का वह बयान मोदी सरकार का नुकसान कर गया, जिसमें उन्होंने चीन द्वारा लद्दाख के इलाके पर कब्जा किये जाने की बात कही थी। उनका यह बयान मोदी सरकार के दावों के बिल्कुल उलट था। जिसके बाद से सरकार की तरफ से लद्दाख के जमीन विवाद पर लोग बयान देने तक से कतरा रहे हैं। जरूरी है कि हम सच का सामना आंख खोलकर करें।