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बंदूक से नहीं, मेज पर बातचीत से निकलेगा समाधान: सनाते

मणिपुर सरकार में शामिल होने पर कुकी जो विधायक की सफाई

  • कूटनीतिक भागीदारी बनाम सामाजिक बहिष्कार

  • शांति और आजीविका के लिए सरकार जरूरी

  • समाधान का रास्ता क्या होगा वार्ता या संघर्ष?

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः मणिपुर में जारी जातीय संघर्ष के बीच नई सरकार का गठन और उसमें कुकी-जो समुदाय के विधायकों की भागीदारी ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। शुक्रवार को चुराचांदपुर में विरोध प्रदर्शन के दौरान तीन कुकी-जो विधायकों के पुतले जलाए जाने के बाद, टिपईमुख निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा विधायक न्गुरसांगलुर सनाते ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार में शामिल होने का अर्थ आत्मसमर्पण कतई नहीं है।

मणिपुर में मई 2023 से जारी हिंसा के बाद यह पहला मौका है जब कुकी-जो समुदाय के विधायक सरकारी प्रक्रिया में शामिल होने के लिए इंफाल पहुंचे हैं। युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व वाली नई सरकार में सनाते के साथ एल.एम. खाऊटे और नवनियुक्त उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन ने शपथ ली है। हालांकि, इस कदम को कुकी-जो काउंसिल ने विश्वासघात करार देते हुए उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया है।

सनाते ने तर्क दिया कि पिछले डेढ़ साल से लोग विस्थापित हैं, शिविरों में रह रहे हैं और दिहाड़ी मजदूर दाने-दाने को मोहताज हैं। उन्होंने कहा, बिना सरकार के शांति संभव नहीं है। प्रशासनिक अधिकारियों (ब्यूरोक्रेट्स) के पास विधायी शक्ति नहीं होती, वह केवल आदेश लागू करते हैं। जनता की समस्याओं को दूर करने के लिए विधानसभा का सुचारू रूप से चलना अनिवार्य है।

विधायक सनाते ने नगा शांति वार्ता का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे नगा लोग दशकों से बातचीत के साथ-साथ शासन का हिस्सा बने हुए हैं, वैसे ही कुकी-जो समुदाय को भी करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अलग प्रशासन की मांग पर यूपीएफ और केएनओ भारत सरकार के साथ राजनीतिक बातचीत जारी रखेंगे। यह एक लंबी प्रक्रिया है।

तात्कालिक आवश्यकता: लोगों को अपने घरों को लौटने और विकास कार्यों को गति देने के लिए सत्ता में भागीदारी जरूरी है।

सनाते के अनुसार, किसी भी समस्या का अंत मेज पर बैठकर बातचीत से होता है, बंदूकों और हत्याओं से नहीं। और उस मेज का हिस्सा बनने के लिए हमारा सरकार में होना जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि वे अपनी जनता के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि एक स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठा रहे हैं। उनके अनुसार, विरोध करने वाले समूह और उनके निर्वाचन क्षेत्र की जनता की जमीनी जरूरतों में अंतर है।