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पिछले दस वर्षों में राज्यों की वित्तीय स्थिति बिगड़ी

तीन गुणा से अधिक बढ़ गया है कर्ज

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः देश के राज्यों पर बढ़ते कर्ज के बोझ की स्थिति चिंताजनक है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में राज्यों का कुल कर्ज तीन गुना से भी अधिक बढ़ गया है, जो उनकी वित्तीय सेहत पर गहरा दबाव डाल रहा है। यह चौंकाने वाला खुलासा सीएजी के उप-नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक संजय मूर्ति ने शुक्रवार को राज्यों के वित्त सचिवों के सम्मेलन में किया।

सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि देश के 28 राज्यों का कुल कर्ज वित्तीय वर्ष 2022-23 तक बढ़कर 59.60 लाख करोड़ रुपये हो गया है। यह आंकड़ा दस साल पहले, यानी वित्तीय वर्ष 2013-14 में राज्यों के कुल कर्ज 17.57 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 3.3 गुना अधिक है। यह भारी वृद्धि राज्यों की खर्च करने की आदत और राजस्व जुटाने की क्षमता के बीच बढ़ते अंतर को दर्शाती है।

कर्ज की गंभीरता को समझने के लिए, इसे राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के प्रतिशत के रूप में देखना आवश्यक है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों के कर्ज का बोझ जीएसडीपी के अनुपात में भी बढ़ा है। वित्तीय वर्ष 2013-14 में यह अनुपात 16.66 फीसदी था, जो वित्तीय वर्ष 2022-23 में बढ़कर 23 फीसदी हो गया।

रिपोर्ट में राज्यों की वित्तीय स्थिति में बड़ी असमानता भी उजागर हुई है। जीएसडीपी के प्रतिशत के हिसाब से कर्ज के बोझ में पंजाब सबसे ऊपर है, जहां यह अनुपात 40.35 फीसदी है। यह आंकड़ा राज्य की अर्थव्यवस्था पर कर्ज के अत्यधिक दबाव को दर्शाता है। इसके विपरीत, ओडिशा में कर्ज का बोझ सबसे कम, यानी मात्र 8.45 फीसदी है, जो उसकी अपेक्षाकृत बेहतर वित्तीय प्रबंधन को इंगित करता है।

कुल मिलाकर, आठ राज्यों पर उनके जीएसडीपी के 30 फीसदी से ज्यादा कर्ज का बोझ है, जो उन्हें उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखता है। वहीं, छह राज्यों में यह अनुपात 20 फीसदी से कम है, जो उन्हें अधिक स्थिर स्थिति में रखता है। बाकी राज्यों का कर्ज का बोझ 20 से 30 फीसदी के बीच है।

राज्यों का संयुक्त कर्ज बोझ अब राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण कारक बन गया है। वित्तीय वर्ष 2023 में, राज्यों का संयुक्त कर्ज बोझ देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 22.17 फीसदी है। राज्यों के इस बढ़ते कर्ज के कारण ब्याज भुगतान पर होने वाला खर्च उनके राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खा जाता है, जिससे विकास कार्यों और सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों में कमी आती है।

राज्यों को राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने, राजस्व सृजन के प्रयासों को बढ़ाने और गैर-जरूरी खर्चों को नियंत्रित करने की तत्काल आवश्यकता है ताकि वे भविष्य में किसी बड़े वित्तीय संकट से बच सकें। इस रिपोर्ट ने राज्यों को अपनी वित्तीय नीतियों पर गंभीरता से पुनर्विचार करने का स्पष्ट संकेत दिया है।