मुगल काल की पारिवारिक रीति अब भी कायम है
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वर्ष 1722 में पहली बार यहां पूजा हुई
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अब यह एक सार्वजनिक पूजा बन गया
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बांग्लादेश सीमा के बिल्कुल करीब है इलाका
राष्ट्रीय खबर
कोलकाताः भारत-बांग्लादेश सीमा पर, उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट अनुमंडल में स्थित हसनाबाद, रामेश्वरपुर में घोष परिवार की 303 साल पुरानी दुर्गा पूजा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह इतिहास, संस्कृति, कला और नारी शक्ति का एक अनोखा संगम भी है।
यह पूजा 1722 में गदाधर घोष द्वारा शुरू की गई थी और आज भी उनकी वंशज इस परंपरा को पूरे समर्पण के साथ निभा रहे हैं। यह पूजा अब केवल घोष परिवार तक सीमित नहीं रही है, बल्कि एक सार्वभौमिक ग्राम पूजा बन गई है, जिसमें पूरा समुदाय मिलकर जश्न मनाता है।
इस पूजा का सबसे अनूठा पहलू यह है कि यहाँ दस भुजाओं वाली देवी दुर्गा की प्रतिमा विशेष रूप से दास परिवार की महिला मूर्तिकारों द्वारा बनाई जाती है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। मूर्तिकार साधना दास बताती हैं, हमारी पुरानी पीढ़ी, और अब हम भी, उसी परंपरा का पालन करते हुए मूर्तियाँ बना रहे हैं।
यह तथ्य अपने आप में नारी शक्ति का एक अद्भुत उदाहरण है, जो दर्शाती है कि सदियों से चली आ रही परंपरा में महिलाओं ने किस तरह कला और कौशल के माध्यम से अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाए रखा है। ये महिला मूर्तिकार न केवल मिट्टी को आकार देती हैं, बल्कि वे अपनी कला में भक्ति, विश्वास और सदियों पुरानी परंपरा की भावना भी भरती हैं।
घोष परिवार का यह प्राचीन भवन, जिसे आज ठाकुरदलन के नाम से जाना जाता है, अब भले ही जमींदारी के वैभव से मुक्त हो, लेकिन यह इतिहास और संस्कृति का एक जीता-जागता संग्रहालय है। इसकी दीवारों में अनेक कहानियाँ छिपी हैं। यह भवन केवल पूजा का स्थल नहीं है, बल्कि यह बांग्ला सिनेमा का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक तरुण मजूमदार की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निमंत्रण (1971) की शूटिंग इसी घऱ के आंगण में हुई थी। परिवार की सदस्य तृप्ति घोष उस समय की यादें साझा करते हुए बताती हैं कि कैसे अनूप कुमार और संध्या रॉय जैसे दिग्गज कलाकार इस भवन में रहते थे, बकरियां चराते थे और पास की इच्छामती नदी में नौका विहार करते थे। इसके अलावा, महान अभिनेता सौमित्र चटर्जी की फिल्म ‘षष्ठी’ की पटकथा भी इसी ऐतिहासिक इमारत में लिखी गई थी। इस तरह, घोषबाड़ी का यह भवन सिनेमाई इतिहास का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया है।
यह पूजा प्रतिपदा से शुरू होकर दस दिनों तक चलती है, और आज भी अपने प्राचीन रीति-रिवाजों और संस्कृति को बनाए हुए है। यह सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि एक सामुदायिक उत्सव है जो अतीत और वर्तमान को जोड़ता है। भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित होने के कारण, यह पूजा सीमा के दोनों ओर के लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है। यह न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह उन यादों और संबंधों को भी संजोए हुए है जो विभाजन के बाद भी बने हुए हैं।
घोष परिवार की यह 303 साल पुरानी दुर्गा पूजा इस बात का प्रमाण है कि कैसे परंपराएं समय की कसौटी पर खरी उतरती हैं और नई पीढ़ियों को अपने इतिहास और संस्कृति से जोड़ती रहती हैं। यह नारी शक्ति का सम्मान करने, कला का जश्न मनाने और एक समुदाय को एकजुट रखने का एक अनूठा उदाहरण है। यह पूजा हमें याद दिलाती है कि इतिहास केवल किताबों में नहीं, बल्कि हमारी परंपराओं और उत्सवों में भी जीवित रहता है।