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राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता दुखु मांझी की दयनीय हालत, देखें वीडियो और शेयर करें

पर्यावरण योद्धा को सरकारी उपेक्षा का सामना

राष्ट्रीय खबर

रांचीः सोशल मीडिया पर हाल ही में एक दिल दहला देने वाला वीडियो सामने आया है, जिसमें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित पर्यावरण कार्यकर्ता दुखु मांझी की चौंकाने वाली दुर्दशा को उजागर किया गया है। पुरुलिया के एक गाँव से सामने आए इस वीडियो में पत्रकार ने बांग्ला भाषा में दुखु मांझी के संघर्षों का मार्मिक चित्रण किया है, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को अंदर तक झकझोर देगा।

देखें यह वीडिओ, जो बांग्ला भाषा में है

दुखु मांझी को उनके असाधारण पर्यावरण संबंधी योगदान के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया था। उन्होंने बताया कि उन्होंने श्मशान से बची हुई लकड़ियों का भी उपयोग कर अनगिनत पेड़ लगाए हैं, यह दर्शाते हुए कि कैसे उन्होंने ‘जीवन’ को सबसे अप्रत्याशित स्रोतों से भी बचाने का प्रयास किया। उनके इस निस्वार्थ सेवा के बावजूद, उनका घर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है। बारिश के कारण घर में नमी रोकने के लिए परिवार को फर्श पर पुआल बिछाकर अस्थायी उपाय करने पड़ रहे हैं, जो उनकी दयनीय स्थिति का प्रमाण है।

सम्मान पत्रों को बचाने की जद्दोजहद और सरकारी उदासीनता

विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति ने पर्यावरण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, आज उसे अपने घर में खाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। परिवार ने अपने राष्ट्रपति सम्मान पत्र, पदक और अखबारों की कटिंग को एक झोले में सहेज कर रखा है, ताकि वे बारिश से सुरक्षित रहें। यह दृश्य उनकी उपलब्धियों और वर्तमान हालातों के बीच के भारी विरोधाभास को दर्शाता है। वीडियो में पत्रकार द्वारा भोजन और राशन उपलब्ध कराने के बाद ही परिवार की तात्कालिक चिंताएं कुछ कम हो पाईं।

दुखु मांझी ने कई बार स्थानीय बीडीओ से संपर्क किया और अपने घर की हालत देखने का अनुरोध किया, लेकिन उन्हें केवल सरकारी अधिकारियों की उदासीनता का ही सामना करना पड़ा। राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता होने के बावजूद, किसी भी सरकारी अधिकारी ने उनकी सुध नहीं ली, जो व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है।

एक मार्मिक पुकार: सरकार से मदद की अपील

वीडियो के अंत में पत्रकार सभी से इस वीडियो को अधिक से अधिक साझा करने का अनुरोध करता है, ताकि सरकार का ध्यान दुखु मांझी की दयनीय स्थिति की ओर आकर्षित किया जा सके और उन्हें उचित सहायता मिल सके। यह कहानी न केवल एक व्यक्ति की दुर्दशा है, बल्कि यह उन अनेक गुमनाम नायकों की भी कहानी है जिन्हें उनके योगदान के बावजूद समाज और व्यवस्था द्वारा भुला दिया जाता है।

यह कहानी हमें समाज के उन महत्वपूर्ण व्यक्तियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी की याद दिलाती है जो बिना किसी स्वार्थ के अपना जीवन लोक कल्याण में लगा देते हैं। क्या हमें ऐसे नायकों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं देना चाहिए?