Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
मुकेश अंबानी की Jio का 'महा-धमाका'! Airtel और Vi के उड़े होश; पेश किया ऐसा प्लान कि देखते रह गए दिग्... Vastu Tips for Women: महिलाओं के इन कामों से घर में आता है दुर्भाग्य, लक्ष्मी जी छोड़ देती हैं साथ; ज... पार्लर का खर्चा बचाएं! घर पर बनाएं ये 'मैजिकल' हेयर जेल, रूखे-बेजान बाल भी बनेंगे रेशम से मुलायम और ... Raebareli Crime News: रायबरेली में मामूली विवाद पर हिस्ट्रीशीटर का हमला, परिवार के 6 लोग घायल; ढाबा ... West Bengal Election 2026: बंगाल में चुनाव बाद हिंसा रोकने को आयोग सख्त, 15 जून तक तैनात रहेगी सेंट्... Patna Metro Phase 2 Inauguration: पटना मेट्रो के दूसरे चरण का उद्घाटन कब? आ गई डेट; बेली रोड से बैरि... उन्नाव में 'काल' बनी ड्राइवर की एक झपकी! डिवाइडर से टकराकर पलटी तेज रफ्तार बस; 1 महिला की मौत, 22 या... Lucknow Builder Honeytrap Case: लखनऊ के बिल्डर पर रेप और ब्लैकमेलिंग का केस, पीड़िता से मांगी 5 लाख ... Sanjay Nishad News: क्या BJP का साथ छोड़ेंगे संजय निषाद? गोरखपुर में छलके आंसू, सपा-बसपा पर निशाना औ... Gorakhpur Religious Conversion: गोरखपुर में अवैध धर्मांतरण का गिरोह पकड़ा गया, 4 अरेस्ट; अंधविश्वास ...

बदल गयी है युद्ध की पूरी तकनीक भी

पहलगाम आतंकी हमले के बाद हुए ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय वायुसेना की शक्ति और सामर्थ्य का बेजोड़ प्रदर्शन किया। यह केवल पाकिस्तान को दिया गया एक मुंहतोड़ जवाब ही नहीं था, बल्कि यह युद्ध कौशल के एक नए युग का सफल परीक्षण भी साबित हुआ। हालांकि, हमें इस सफलता पर ही संतुष्ट होकर नहीं बैठना चाहिए।

जैसा कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने उचित ही कहा है कि भविष्य के युद्ध आज की तकनीक से लड़े जाने चाहिए, न कि पुराने हथियार प्रणालियों से। युद्ध कौशल की तकनीकें लगातार विकसित हो रही हैं, और इसमें बढ़त बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है। जो भी देश ऐसा करने में विफल रहेगा, उसकी सुरक्षा निश्चित रूप से खतरे में पड़ जाएगी।

जनरल चौहान ने बिल्कुल सही कहा है कि मानवरहित हवाई वाहन (यूएवी) या ड्रोन गैर-संपर्क युद्ध के तेजी से विकसित हो रहे परिदृश्य में एक परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में उभरे हैं। आमने-सामने की लड़ाई के विपरीत, ड्रोन तकनीक का लगातार विकास इसे एक ऐसा घातक हथियार बना रहा है जो दुश्मन देश के प्रमुख रक्षा प्रतिष्ठानों जैसे लक्ष्यों को तुरंत पहचान कर उन पर हमला कर सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, भारत मुख्य रूप से अपनी मजबूत वायु रक्षा प्रणाली के दम पर पाकिस्तान सशस्त्र बलों द्वारा इस्तेमाल किए गए अधिकांश ड्रोनों को बेअसर करने में सफल रहा। ठीक ऐसा ही हम रूस यूक्रेन युद्ध अथवा इजरायल और ईरान के युद्ध में भी देख चुके हैं। इन तमाम युद्धों की तकनीक पारंपरिक युद्ध से बिल्कुल अलग है, जिसमें पहले सेना आगे बढ़कर हमला करती थी। अब तो देश के अंदर से ही दुश्मन के ठिकानों पर सटीक निशाना लगाया जा रहा है।

भविष्य के किसी भी युद्ध में, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान के करीबी सहयोगी उसे बेहतर यूएवीs की आपूर्ति कर सकते हैं ताकि पाकिस्तान की स्थिति को सुधारा जा सके। इस खतरे के प्रति सतर्क रहते हुए, भारत के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि हम यूएवीs और स्वदेशी मानवरहित प्रणालियों के विकास पर विशेष ध्यान केंद्रित करें।

इसके साथ ही, यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि ये प्रणालियाँ भारतीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुकूल हों। तभी हम आने वाली चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर पाएंगे। हाल के दिनों में, यूरोप और एशिया में जारी संघर्षों के दौरान ड्रोन और मानवरहित विमानों ने एक निर्णायक भूमिका निभाई है।

इस दिशा में, भारत पूर्वी यूरोप में ड्रोन-प्रधान संघर्ष से महत्वपूर्ण सबक ले सकता है। उदाहरण के लिए, यूक्रेन ने सैन्य शक्ति, तोपखाने और टैंकों के मामले में रूस की बढ़त का मुकाबला करने के लिए यूएवीs का भरपूर इस्तेमाल किया है। यूक्रेन की इस रणनीति ने रूस को भी अपना ध्यान यूएवी तकनीक पर केंद्रित करने के लिए मजबूर किया है।

रक्षा विशेषज्ञों का अनुमान है कि दोनों देश प्रतिवर्ष लाखों की चौंका देने वाली दर से ड्रोन का निर्माण कर रहे हैं। ड्रोन उत्पादन के क्षेत्र में यूक्रेन का एक महाशक्ति के रूप में उदय ने भारत को ऐसे क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया है, जहां अत्याधुनिक नवाचार ही सब कुछ है।

चाहे इनका उपयोग निगरानी, स्ट्राइक ऑपरेशन के लिए हो या रडार से छिपकर उड़ने वाली मशीनों को सुरक्षित बनाने के लिए। भारत के लिए यह सुनिश्चित करना एक चुनौती है कि उसके ड्रोन और ड्रोन-रोधी प्रणालियाँ दुश्मन की ड्रोन तकनीक से बेहतर साबित हों।

निश्चित रूप से, आने वाले वर्षों में यूएवीs एक परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में निर्णायक साबित होंगे। ऐसे में, हमें पारंपरिक युद्ध कौशल से आगे बढ़कर नई चुनौतियों का मुकाबला करना होगा। हमें न केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, बल्कि ड्रोन और यूएवी तकनीक में ऐसी महारत हासिल करनी है कि हम इनके निर्यातक के रूप में हथियार बाजार में अपनी पहचान बना सकें।

हम देख रहे हैं कि आज दुनिया में उन्हीं देशों की कूटनीति का वर्चस्व है, जिनका हथियार उद्योग और तकनीकी नवाचार में बोलबाला है। दूसरे तरफ इन गैर पारंपरिक हथियारों की दो अलग विशेषताएं इन्हें अलग और अधिक लोकप्रिय बनाती है। टैंक अथवा हवाई जहाज के संचालन में जो सामान्य खर्च होता है, वह अत्यधिक है और नुकसान की स्थिति में यह आर्थिक बोझ भी बन जाता है।

दूसरी तरफ अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन अथवा यूएवी नष्ट होने के लिए ही बनाये जाते हैं जो लक्ष्य पर पहुंचकर विस्फोट कर जाते हैं। यह नये तरीके के युद्ध का आर्थिक पहलु है। दूसरी विशेषता अपने पक्ष के जान के नुकसान को कम करना है। जिसमें सैनिकों की मौत पर देश की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ता है।