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आवाज मैं ना दूंगा, आवाज मैं ना दूंगा. .. …

आवाज मैं ना दूंगा का दूसरा अर्थ है कि अपनी जुबान से नाम नहीं लूंगा। अब राहुल गांधी हो या दूसरे, कोई कितना भी उकसाते रह जाए लेकिन अपने मोदी जी धून के पक्के आदमी है। दोस्ती निभा रहे हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बारे में अपनी जुबान से कुछ नहीं कह रहे हैं। दूसरी तरफ टरमप भइया हैं कि करीब एक दर्जन बार कह चुके हैं कि दरअसल भारत और पाकिस्तान का युद्ध उन्होंने ही रूकवाया है।

बेचारे अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों क्रेडिट के लिए ऐसे बेचैन हैं, जैसे कोई बच्चा अपनी ड्राइंग पर पहला इनाम का स्टिकर ढूंढ रहा हो। दिक्कत ये है कि भारत ने उनके शांति दूत वाले दावे को सीधे नकार दिया है, जिससे ट्रंप का शांति पुरस्कार वाला सपना थोड़ा खटाई में पड़ गया है। हाल ही में एक इंटरव्यू में ट्रंप का दर्द छलक आया। उनका कहना था, अरे भाई! मैंने ये क्रेडिट के लिए नहीं किया था, लेकिन मुझे बहुत गर्व है कि मैंने दो परमाणु महाशक्तियों को भिड़ने से रोका।

ट्रंप ने बताया कि उन्होंने दोनों देशों के बहुत प्रतिभाशाली लोगों से बात की थी। अब ये तो वो ही जानें कि वो टॉक शो में थे या किसी व्यापारिक डील में, क्योंकि ट्रंप ने आगे कहा, मैंने उनसे कहा, सुनो भाई, अगर तुम लोग एक-दूसरे पर मिसाइल दागने लगे, तो हम तुम्हारे साथ कोई व्यापार सौदा नहीं करेंगे! ऐसा लगता है, जैसे ट्रंप ने शांति समझौते को किसी व्यापारिक सौदे में बदल दिया हो, जहां युद्ध बंद करो शर्त थी, वरना नो डील।

उन्होंने तो यहां तक कह दिया, परमाणु धूल बहुत तेजी से उड़ती है, कहीं हम पर ही न आ जाए! लगता है, ट्रंप को लगा होगा कि अगर भारत-पाक भिड़े, तो उनके गोल्फ कोर्स पर भी धूल जम जाएगी, और फिर उन्हें सफाई का क्रेडिट भी नहीं मिलेगा। ट्रंप ने बड़े फख्र से कहा, मैंने उस युद्ध को रोक दिया। और फिर एक मासूम से अंदाज में जोड़ दिया, अब, क्या मुझे क्रेडिट मिलेगा?

मुझे किसी भी चीज का क्रेडिट नहीं मिलेगा। ये तो वही बात हो गई कि काम मैंने किया, पर नाम किसी और का हो गया! बेचारे ट्रंप! उन्हें तो इस बात का भी अफसोस था कि काश वो रूस और यूक्रेन के बीच भी ऐसा कर पाते। शायद उन्हें लगा कि युद्ध रोकने वाला वाला तमगा मिलने से उनका अगला चुनाव आसान हो जाएगा।

उन्होंने भारत और पाकिस्तान दोनों को बधाई भी दी। ट्रंप ने कहा, भारत के नेता, जो एक महान व्यक्ति हैं, कुछ हफ्ते पहले यहां थे। हमने कुछ बेहतरीन बातचीत की। और फिर पाकिस्तान के बारे में भी कुछ ऐसे ही मीठे बोल बोले, उनके पास बहुत मजबूत नेतृत्व है। लगता है, ट्रंप को अब हर जगह सिर्फ मजबूत नेतृत्व वाले ही लोग दिखते हैं, खासकर जब उन्हें कोई क्रेडिट की उम्मीद हो!

आखिर में, ट्रंप ने अपनी व्यथा दोहराई, मुझे किसी भी चीज का क्रेडिट मत दीजिए, लेकिन कोई और ऐसा नहीं कर सकता था। मैंने इसे रोक दिया। मुझे इस पर बहुत गर्व था। ऐसा लगता है, जैसे कोई बच्चा अपनी टूटी हुई गुल्लक दिखाते हुए कह रहा हो, पैसे तो मैंने ही जमा किए थे, पर खर्च किसी और ने कर दिए। तो क्या हम मान लें कि ट्रंप ने वाकई परमाणु युद्ध रोका, या ये बस मैं ही मैं वाले बयानों की एक और कड़ी है? क्या इस बार उन्हें शांति पुरस्कार के बजाय सबसे बड़ा क्रेडिट सीकर वाला पुरस्कार मिलना चाहिए?

इसी बात पर एक पुरानी फिल्म दोस्ती का यह गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था मजरूह सुलतानपुरी ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने। इसे मोहम्मद रफी ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे

फिर भी कभी अब नाम को तेरे

आवाज़ मैं न दूँगा, आवाज़ मैं न दूँगा

देख मुझे सब है पता

सुनता है तू मन की सदा

सुनता है तू मन की सदा

मितवा …

मेरे यार तुझको बार बार

आवाज़ मैं न दूँगा, आवाज़ मैं न दूँगा

चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे

दर्द भी तू चैन भी तू

दरस भी तू नैन भी तू

मितवा …

मेरे यार तुझको बार बार

आवाज़ मैं न दूँगा, आवाज़ मैं न दूँगा

दूसरी तरफ राहुल गांधी हैं कि सिर्फ मोदी ही नहीं उनके समर्थकों तक को खुलकर चुनौती देते हुए इस पर बयान की मांग कर रहे हैं। अब बिहार के चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हुए भी उन्होंने नरेंद्र, सरेंडर वाला जुमला दोहरा दिया। पता नहीं मोदी जी को चुप रहने यानी आवाज नहीं देने की क्या क्या कीमत चुकानी पड़ रही है।