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यह तेरा घर यह मेरा घर

घर के चक्कर में कौन कौन धरे गये हैं, यह तो इंडियन पॉलिटिक्स पर गौर करने से पता चल जाता है। बेचारे आम आदमी वाले सीएम यानी अरविंद केजरीवाल इसी घर के चक्कर में ऐसे फंसे कि भाई लोगों ने उन्हें घर से ही बेघर कर दिया। ऊपर से मोदी जी के राजमहल की चर्चा कर दी तो पूरी की पूरी भाजपा की नाराज हो गया।

लेकिन अब नाटक के अगले सीन में केजरीवाल के शीशमहल के सोने का टॉयलेट देखना बाकी रह गया है। चुनाव से पहले तो भाजपा वालों ने चीख चीखकर इस शीश महल के आलीशान निर्माण की बात कही थी। अब चुनाव बीत गया तो मीडिया वालों को वहां ले जाने से कतरा रहे हैं। मुझे तो डाउट हो रहा है कि वाकई वहां सोने का टॉयलेट है अथवा यह भी कोई कहानी है।

ऐसी ही कहानी दिल्ली के शराब घोटाले की भी थी। अब भी दिल्ली विधानसभा में इस पर चर्चा चल रही है पर कहीं से किसी ने अब तक इस बारे  में आम आदमी की समझ में आने वाले कोई सबूत नहीं दिया है। सीएजी की रिपोर्ट को इतनी गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि पहले भी देश ने सीएजी की रिपोर्ट पर भरोसा कर और कांग्रेस की सरकार के खिलाफ वोट देकर नतीजा देख लिया है।

अब तो कोई कंफ्यूजन भी नहीं है कि उस वक्त के सीएजी विनोद राय दरअसल संघ के व्यक्ति थे, जिन्होंने इतना बड़ा बवाल खड़ा कर दिया कि डॉ मनमोहन सिंह क सरकार ही उलट गयी। कितने मंत्री दोनों घोटाले में जेल भी चले गये। बाद में अदालत में जब साबित करने की बारी आयी तो एक एक कर सभी जांच एजेंसियों ने हाथ खड़े कर दिये। इसलिए दिल्ली के मुख्यमंत्री आवास की सीएजी रिपोर्ट से कुछ होना जाना नहीं है। अरविंद केजरीवाल को कुर्सी से हटाना था तो वह काम पूरा हो चुका है।

वैसे आम आदमी पार्टी वाले लगातार चुप रहेंगे, इसकी बहुत कम उम्मीदी है। हो सकता है कि फिर से अपने मोदी जी के राजमहल पर कोई नया खुलासा कर दें।दिल्ली के सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले भी अच्छी तरह समझ रहे हैं कि जब तक दोनों दलों के बीच ऐसी खींचतान जारी रहेगी, उनके दिन आराम से कटते रहेंगे।

इसी बात पर एक पुरानी फिल्म साथ साथ का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था जावेद अख्तर ने और संगीत में ढाला था कुलदीप सिंह ने। इसे जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

ये तेरा घर ये मेरा घर , किसीको देखना हो गर

तो पहले आके माँग ले , मेरी नज़र तेरी नज़र

ये तेरा घर ये मेरा घर , ये घर बहोत हसीन है

ना बादलों की छाँव में, ना चांदनी के गांव में

ना फूल जैसे रास्ते, बने हैं इसके वास्ते

मगर ये घर अजीब है, ज़मीन के करीब है

ये ईंट-पत्थरों का घर, हमारी हसरतों का घर

ये तेरा घर ये मेरा घर , ये घर बहोत हसीन है

जो चाँदनी नहीं तो क्या ये रोशनी है प्यार की

दिलों के फूल खिल गये, तो फ़िक्र क्या बहार की

हमारे घर ना आएगी कभी ख़ुशी उधार की

हमारी राहतों का घर, हमारी चाहतों का घर

ये तेरा घर ये मेरा घर , ये घर बहोत हसीन है

यहाँ महक वफाओं की, मोहब्बतों का रंग है

ये घर तुम्हारा ख़्वाब है, ये घर मेरी उमंग है

ना आरज़ू पे कैद है, ना हौसले पे जंग है

हमारी हौसलों का घर, हमारी हिम्मतों का घर

ये तेरा घर ये मेरा घर , ये घर बहोत हसीन है

वहां से लौटते हैं तो अपने झारखंड में भी मुख्यमंत्री के नये घऱ की चर्चा होने लगी है। दरअसल इसे राजनीति नहीं गुप्तचरी की नजर से देखना अधिक उचित होगा। लगता है कि हेमंत भइया को अपने पुरानी साथी पर भरोसा नहीं रह गया है। भाई साहब भी बीच में बैठकर दोनों नावों की सवारी करने लगे थे।

सभी बंगलों में तैनात पुलिस वाले तो आखिर पुलिस वाले ही हैं, किसी ने ऊपर बात पहुंची तो ऊपर वालों का दिमाग ठनका। मुख्यमंत्री आवास के नया स्वरुप देने के नाम पर बड़ी चालाकी से एक साहब को सीएम हाउस से  दूर कर दिया गया ताकि आते जाते ही सही जासूसी और चुगलखोरी का काम तो बंद हो। वरना कभी तो माहौल ऐसा था कि हुजूर की मर्जी के बगैर एक पत्ता भी नहीं हिलता था।

बाकी हाकिमों के भी नये घर लगभग बनकर तैयार हैं पर सभी की परेशानी यह है कि उतनी दूर चले जाएंगे तो मिलने वालों का क्या होगा। मंत्री आवास पर भीड़ ना हो तो रौब नहीं बनता है। अब तेरा घऱ और मेरा घर करते करते मैंगो मैन से दूर गये तो पॉलिटिक्स ही डगमगा जाएगी।