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झूठ बोले कौवा काटे.. .. …

झूठ बोलना भारतीय राजनीति की सफलता का शायद एक अनिवार्य सत्य बन गया है पर हादसों के मामले में भी झूठ बोला जाए, यह स्वीकार्य नहीं है। कमसे कम देश का मैंगो मैन यानी आम आदमी इसे अच्छी नजरों से नहीं देखता है। प्रयागराज के महाकुंभ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह गलती भारी पड़ गयी है। खुद शंकराचार्य ने भी इस झूठ के लिए न सिर्फ उनकी सार्वजनिक आलोचना की है बल्कि नैतिकता के आधार पर इस्तीफा तक की मांग कर दी है।

दरअसल पूरा पेंच महाकुंभ हादसे के बाद मौत के आंकड़ों को लेकर है। योगी आदित्यनाथ ने वहां की भगदड़  में लोगों की  मौत होने की जानकारी को अफवाह बताया था। सिर्फ योगी आदित्यनाथ ही नहीं अनेक साइबर सेल वालों ने भी इसे आनन फानन में प्रचारित करने का काम किया था। सभी की मंशा थी कि लोग इसे अफवाह समझकर भूल जाएं। पर पुरानी कहावत है कि जब जिंदा आदमी कुछ नहीं बोलता तो कई बार लाशें भी बोलती है। यहां भी महाकुंभ की भगदड़ में ऐसा ही कुछ हो रहा है। पहली बार औपचारिक तौर पर वहां के एक पुलिस अधिकारी ने मौत का आंकड़ा देते हुए पहचाने गये लाशों की जानकारी दी है।

विपक्ष को इस आपदा में भी अवसर मिल गया है और सवाल खड़े कर दिये गये हैं। राजनीतिक स्तर पर ऐसी बयानबाजी का कितना असर होता है, इसे खुद नेता भी अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन जब धर्माचार्यों की तरफ से सत्ता पर ऊंगली उठायी जाए तो स्थिति बिगड़ती है।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि इतनी सारी तैयारियों के बावजूद यह घटना घटित हुई, यह निश्चित रुप से दुखद है. उन्होंने कहा कि इतनी सारी तैयारियों के बावजूद यह घटना कैसे हुई? जबकि सरकार दावा को पता था और वे कह भी रहे थे कि 40 करोड़ लोग आएंगे, जब इतने लोग आ रहे थे तो वैसी व्यवस्था भी होनी चाहिए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती कटाक्ष करते हुए कहा, जितने लोगों के लिए अपने घर में भोजन हो, जितने लोगों के लिए बैठने की जगह हो, उतने ही लोगों को बुलाया जाता है। उन्होंने कहा, आपने 40 करोड़ की व्यवस्था की है और फिर घटना घटी तो फिर विचार का विषय है।

इसी बात पर सुपरहिट फिल्म बॉबी का यह गीत याद आने लगा है। गीत के बोल इस तरह हैं।

झूठ बोले कौवा काटे, काले कौवे से डरिओ
मैं माइके चली जाऊंगी तुम देखते रहियो
अरे झूठ बोले
झूठ बोले कौवा काटे काले कौवे से डरिओ
मैं माइके चली जाऊंगी तुम देखते रहियो
अरे झूठ बोले
झूठ बोले कौवा काटे काले कौवे से डरिओ
मैं माइके चली जाऊंगी तुम देखते रहियो
मैं माइके चली जाऊंगी तुम देखते रहियो
तू माइके चली जायेगी मैं डंडा लेकर आऊंगा
मैं डंडा लेकर आऊंगा

तू डंडा लेकर आएगा

मैं कुए में गिर जाऊंगी मैं कुए में गिर जाऊंगी
मैं रस्सी से खिंचवाऊंगा मैं पेड़ पे चढ़ जाऊंगी
मैं आरी से कटवाऊंगा प्यार करे आरी चलवाये
ऐसे आशिक से डरिओ
मैं माइके चली जाऊंगी
तुम देखते रहियो
मैं माइके चली जाऊंगी
तुम देखते रहियो
अरे झूठ बोले कौवा काटे
काले कौवे से डरिओ
मैं माइके चली जाऊंगी तुम देखते रहियो
मैं माइके चली जाऊंगी तुम देखते रहियो
तुम माइके चली जायेगी मैं दूजा ब्याह रचाऊँगा
मैं दूजा ब्याह रचाऊँगा
तू दूजा ब्याह रचाएंगे हाय मेरी सौतन लाएगा
मैं माइके नहीं जाऊंगी मैं माइके नहीं जाऊंगी
मैं माइके नहीं जाऊंगी रे
माइके नहीं जाऊंगी अरे तेरे सदके जाऊंगी रे
माइके नहीं जाऊंगी
मैं सातों वचन निभाऊँगी
अरे माइके नहीं जाऊंगी मैं माइके नहीं जाऊंगी
मैं माइके नहीं जाऊंगी झूठ बोले कौवा काटे
काले कौवे से डरिओ
मैं तेरी सौतन लाऊंगा तुम देखती रहियो
मैं तेरी सौतन लाऊंगा तुम देखती रहियो
झूठ बोले कौवा काटे
काले कौवे से डरिओ
मैं माइके नहीं जाऊंगी तुम देखते रहियो
मैं माइके नहीं जाऊंगी तुम देखते रहियो

खैर अब दिल्ली चुनाव की तरफ लौटते हैं जो वहां शीशमहल और राजमहल का मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया है। फिलहाल चुनावी माहौल में यमुना के जहरीले जल की चर्चा हो रही है। अरविंद केजरीवाल ने इसी पानी को खास लोगों तक बोतल में बंद कर भेजा है। अगर बयानवीर नेताओं या अफसरों को लगता है कि पानी को लेकर राजनीति हो रही है तो वे इसे सार्वजनिक तौर पर ग्रहण करें वरना हरियाणा के मुख्यमंत्री को कुल्ला करते हम सभी ने देखा है।

वैसे चुनाव और चुनावी जल ने अरविंद केजरीवाल का पानी भी उतारा है जब उनके सात वैसे विधायक, जिन्हें इस बार टिकट नहीं दिया गया है, पार्टी छोड़ने का एलान कर चुके हैं। यह तो साफ है कि लगातार सत्ता में रहने से सत्ता संबंधी बीमारियां भी फैलने लगती है। हो सकता है कि केजरीवाल की पार्टी भी इसी बीमारी से ग्रस्त हो। अब चुनाव परिणाम ही बतायेगा कि आम आदमी पार्टी अब भी आम आदमी की पार्टी है अथवा खास लोगों के बीच कैद हो चुकी है।