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रोजगार की चुनौती दिनोंदिन बढ़ेगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोजगार देने पर जो बयान दिया है, वह बहस के केंद्र में है। यह बयान आरबीआई की घोषणा पर आधारित है पर आरबीआई ने यह निष्कर्ष किस आधार पर निकाला, यह स्पष्ट नहीं है।

वैसे हाल के वर्षों के विभिन्न अनुमानों से यह संकेत मिलता है कि देश में गरीबी के स्तर में काफी कमी आई है। अगर गरीबी के दायरे में आने वाले परिवारों को बचाया जा सका तो परिणाम और अच्छे होते।

नैशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च ने इस बारे में एक नया शोध पत्र प्रकाशित किया है जिसमें नागरिकों के लिए सुरक्षा ढांचे को नए सिरे से तैयार करने की बात कही गई है।

इस शोध पत्र में कहा गया है कि 2011-12 में 21.2 फीसदी से 2022-24 में 8.5 फीसदी तक गरीबी के स्तर में उल्लेखनीय कमी आई है। यह आकलन तेंडुलकर गरीबी रेखा के आधार पर किया गया है।

भारत मानव विकास सर्वेक्षण 2004-05, 2011-12 और 2022-23 के आंकड़ों का इस्तेमाल करके शोध पत्र में कहा गया है कि 2024-25 में जिन 8.5 फीसदी लोगों को गरीबों के रूप में चिह्नित किया गया उनमें से 3.2 फीसदी 2011-12 से ही गरीब बने हुए हैं जबकि 2.3 फीसदी लोग नए सिरे से गरीबी के शिकार हुए हैं।

अध्ययन में इस बात को रेखांकित किया गया है कि पुरानी गरीबी का स्तर कम हुआ है जबकि अस्थायी गरीबी बढ़ी है। ऐसे मामलों में परिवार समय-समय पर गरीबी के भंवर में गिरते और उससे उबरते रहते हैं।
इसमें बार-बार गरीबी के शिकार होने वाले परिवारों को संवेदनशील ठहराते हुए कहा गया है कि गरीबी रेखा और उससे 200 फीसदी ऊपर तक के परिवार इस श्रेणी के हैं। कई अकादमिक अध्ययनों में भी इस बात के प्रचुर प्रमाण मिले हैं जो ऐसी संवेदनशीलता बढ़ाने वाले कारकों को चिह्नित करते हैं।
उदाहरण के लिए परिवार में बड़ी संख्या में बच्चों का होना या एक परिवार में आश्रितों की संख्या अथवा भूमिहीनता की स्थिति लोगों के संवेदनशील होने की संभावना बढ़ा देते हैं। बाहरी झटके मसलन प्राकृ़तिक आपदा, परिवार का ध्यान रखने वाले मुखिया की बीमारी या उसकी मौत अथवा पेशाजनित अवसरों में कमी भी परिवारों को किसी भी समय गरीबी के दुष्चक्र में उलझा सकती है। देखा तो यह भी गया है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के परिवार मसलन अनुसूचित जाति और जनजाति के परिवार अथवा अल्पसंख्यक समुदाय के परिवार इस तरह के जोखिम में अधिक होते हैं।
शोध मे गरीबी की गतिशील प्रकृति को रेखांकित किया गया है और सामाजिक सुरक्षा उपायों को लक्षित करने की मौजूदा व्यवस्था की कमियों को उजागर किया गया है। मौजूदा व्यवस्था गरीबी रेखा के नीचे के संकेतकों पर आधारित है और उसकी अपनी सीमाएं हैं जो इसके असर को कम करती हैं।पहली बात, गरीबी रेखा को लेकर ही काफी बहस है। आलोचक कहते हैं कि गरीबी रेखा की सीमा मनमाने ढंग से तय की गई है जो किसी तरह केवल जीवित रहने से संबंधित है। हालांकि हालिया परिवार खपत व्यय सर्वे के आंकड़े बहस के कुछ पहलुओं का समाधान कर सकते हैं। यह भी देखा जाना है कि क्या यह मसले को हल कर सकता है या नहीं।  दूसरी बात, गरीबी की गतिशील प्रकृति को देखते हुए, खासतौर पर संवेदनशील समूहों के मामले में, समय पर आंकड़े नहीं मिलने से परिणाम प्रभावित होते हैं।
अगर सर्वेक्षण समयबद्ध नहीं हुए तो वे परिवारों की आर्थिक स्थिति में बदलाव को सही ढंग से दर्ज नहीं कर पाते। इससे गरीबी के नए उभरते परिदृश्य को हल करना मुश्किल होता है। इसके अलावा बीपीएल कार्ड से कई लाभ जुड़े हैं, फिर चाहे उसे धारण करने वाला गरीब हो या नहीं। इससे भी व्यवस्थागत दिक्कत और संसाधनों का गलत आवंटन सामने आता है। भारत को अपनी संवेदनशील आबादी की जरूरतों को हल करने के लिए बेहतर व्यवस्था की आवश्यकता है। इसके लिए सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को नए सिरे से अधिक समावेशी बनाना होगा। संबंधित कदमों में संवेदनशील समूहों से संबंधित आंकड़े जुटाना, व्यापक निगरानी रणनीति तैयार करना और जोखिम से बचाव आदि शामिल होंगे।

कार्यक्रम का डिजाइन तैयार करने में लचीलापन कमजोर पहलों में सुधार लाने वाला हो सकता है जबकि रोजगार के अवसर तैयार करना भी जरूरी है।  देश में समतापूर्ण और संतुलित विकास के लिए सामाजिक सुरक्षा को बदलते आर्थिक परिदृश्य के साथ तालमेल वाला बनाना अहम है। इसके बीच ही जो सवाल उभर रहा है वह बढ़ती आबादी के लिए नये रोजगार उपलब्ध कराना ही है। दरअसल रोजगार की सर्वाधिक संभावनाएं कृषि में हैं पर कृषि उपज का सही दाम नहीं मिलने की वजह से अब लोग इसमें रूचि नहीं ले रहे हैं। दूसरा सवाल अधिसंख्य आबादी के लिए रोजगार पैदा करने में सरकारी सोच का है।