Breaking News in Hindi

फर्जी नैरेटिव का तेजी से घटता असर

लोकतंत्र में विचार-विमर्श और स्वस्थ विरोध प्रदर्शन को शासन-प्रशासन के संतुलन की मुख्य धुरी माना जाता है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से देखी गई है कि जब भी समाज का कोई वर्ग, किसान या नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों और जायज मांगों को लेकर सड़कों पर उतरता है, तो उसकी वास्तविक समस्याओं पर विचार करने के स्थान पर एक समानांतर नैरेटिव गढ़ दिया जाता है। इस प्रायोजित आख्यान का मुख्य ध्येय आंदोलनकारियों की मंशा पर सवाल उठाना, उनकी साख पर हमला करना और मुख्यधारा के विमर्श को पूरी तरह भटकाना होता है।

 

हालांकि, सूचना के इस नए दौर में आम जनता की सजगता इतनी बढ़ चुकी है कि फर्जी नैरेटिव गढ़ने की यह पुरानी रणनीति अब अपनी प्रासंगिकता और प्रभाव दोनों खोती जा रही है। देश की जनता अब यह भली-भांति समझने लगी है कि किस तरह प्रायोजित प्रचार के जरिए जनहित के बुनियादी मुद्दों को दबाने का प्रयास किया जाता है। यदि पिछले कुछ वर्षों के प्रमुख घटनाक्रमों को याद करें, तो एक स्पष्ट और संगठित ढर्रा नजर आता है। जब देश के किसान अपनी मांगों को लेकर सीमाओं पर आ डटे, तो अचानक से मुख्यधारा के कुछ मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया हैंडल द्वारा उन्हें खालिस्तानी, पाकिस्तानी, देशविरोधी, नक्सली और विदेशी फंडिंग पर पलने वाला घोषित करने का प्रयास किया गया।

इस पूरी कवायद का मकसद आंदोलन के नैतिक बल को कमजोर करना और आम जनता के मन में उनके प्रति अविश्वास पैदा करना था। इसके बाद जब लद्दाख की पर्यावरण और संवैधानिक सुरक्षा के लिए सोनम वांगचुक जैसे प्रख्यात शिक्षाविद और समाजसेवी ने शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया, तो उन्हें भी बख्शा नहीं गया और उन पर चीन का एजेंट होने का ठप्पा लगाने की कोशिश की गई। इतना ही नहीं, नैरेटिव बदलने का यह खेल समय और परिस्थिति के हिसाब से बदलता रहा। हाल ही में जब सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर पहुंचे, तो नैरेटिव गढ़ने वाली प्रयोगशालाओं ने एक नया लेबल ढूंढ निकाला और उन्हें तुरंत अमेरिकी एजेंट करार देने की कोशिश की गई।

इसके साथ ही सोशल मीडिया पर उनके अस्तित्व और उपलब्धियों पर भी सवाल उठाए जाने लगे। दुष्प्रचार फैलाने वाले यह भी भूल गए कि प्रसिद्ध टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति में स्वयं अमिताभ बच्चन द्वारा उनके कार्यों और नवाचारों की सराहना की जा चुकी है और पूरा देश उनकी सेवाओं से परिचित है। एक दौर ऐसा भी आया जब सत्ता के हर निर्णय को, चाहे उसके परिणाम जनता के हित में हों या विपरीत, एक मास्टरस्ट्रोक के रूप में पेश करने की होड़ लग गई। टीवी चैनलों के माध्यम से जनमत को एक खास दिशा में मोड़ने की रणनीति लंबे समय तक चलती रही।

लेकिन यह चाल अब पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है। जब जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक को जबरन चादर में लपेटकर हटाने जैसी घटनाएं घटती हैं, तो आनन-फानन में वे टीवी चैनल भी वहां नजर आने लगते हैं जो उससे पहले तक इस पूरे मुद्दे से आंखें मूंदे हुए थे। बीच में अभिजीत दिपके पर स्याही फेंकने जैसी घटनाओं में शामिल लोगों का महिमामंडन करने का दौर भी चला। यह सारे नए-नए नैरेटिव कौन गढ़ता है, यह भले ही प्रत्यक्ष रूप से सामने न आए, लेकिन सोशल मीडिया में इसे हुबहू प्रसारित करने वाले चेहरों और हैंडल की पहचान अब उजागर हो चुकी है।

हाल के दिनों में फर्जी नैरेटिव गढ़ने वालों के लिए स्थितियां काफी प्रतिकूल हो गई हैं। अब यदि कोई निराधार पोस्ट या भ्रामक विमर्श सोशल मीडिया पर फैलाया जाता है, तो उस पर आम उपयोगकर्ताओं की इतनी अधिक संख्या में प्रतिकूल टिप्पणियां आने लगती हैं कि पोस्ट करने वालों की परेशानी बढ़ जाती है। अपनी पहचान उजागर होने और तीखी आलोचनाओं के डर से अनेक लोग अपने प्रोफाइल को लॉक रखने या टिप्पणियां बंद करने पर मजबूर हो गए हैं।

इसके बाद भी अब फर्जी नैरेटिव गढ़ने में सफलता नहीं मिल पा रही है और जनता का प्रतिकार लगातार बढ़ता जा रहा है। अंततः फर्जी नैरेटिव का यह तेजी से घटता असर इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि भारतीय जनमानस अब मीडिया या प्रायोजित प्रचार के इशारों पर चलने के लिए तैयार नहीं है। जनता अब समझ चुकी है कि देशहित और सत्ताहित में अंतर होता है। किसी भी जायज मांग को ‘देशद्रोह’ या ‘विदेशी षड्यंत्र’ का टैग देकर खारिज करने की मियाद अब पूरी हो चुकी है। आंदोलनकारियों पर तरह-तरह के झूठे तमगे चस्पां करने की राजनीति अब बेअसर हो रही है। यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और सजगता को दर्शाती है, जहाँ अंततः जनचेतना के सामने प्रायोजित दुष्प्रचार को घुटने टेकने ही पड़ते हैं। ऐसे चेहरों की पहचान जारी है और बदले परिवेश में उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।