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कांग्रेसी गुटबाजी की तर्ज पर झारखंड भाजपा का संगठन

  • ओबीसी खेमा की तरफ है नजर

  • महतो वोट के लिए जेपी पटेल का नाम

  • पुराने कार्यकर्ताओं के अंदर उठे हैं नये सवाल

राष्ट्रीय खबर

रांचीः भारतीय जनता पार्टी अपनी लंबी बैठक के बाद भी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का विषय नहीं सुलझा पायी। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के बाद इस पद पर किसी और को लाना आवश्यक हो गया था। इस पद के लिए चर्चा प्रारंभ होते ही गुटबाजी और लॉबिंग भी चालू हो गयी।

जातिगत समीकरणों के आधार पर चुनावी तैयारियों में जुटी भाजपा के लिए सभी समीकरणों को साधना मजबूरी है। बाबूलाल मरांडी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भाजपा ने अपने खेमे से दूर जा चुके आदिवासियों को फिर से अपने पाले में करने का सही फैसला लिया है। शायद इसी वजह से नीलकंठ सिंह मुंडा की दावेदारी कमजोर हो गयी है।

अब नेता प्रतिपक्ष के नाम पर सभी ऐसे समीकरणों पर ध्यान देने की मजबूरी की वजह से कल देर रात तक चली बैठक में एक नाम पर सहमति नहीं बन पायी। ऐसा तब हुआ जबकि केंद्र की तरफ से कई कद्दावर नेता इस बैठक में मौजूद थे। अंदरखाने से मिल रही जानकारी के मुताबिक झामुमो से भाजपा में आये मांडू विधायक जयप्रदेश पटेल को इस रेस में सबसे आगे समझा गया था। इस फैसले के पीछे की चुनावी राजनीति महतो वोट को अपने पाले में करना भी है।

एनडीए में सहयोगी सुदेश महतो लगातार इन इलाकों में अपना जनाधार बढ़ाते जा रहे हैं। गिरिडीह के सांसद और रामगढ़ के मूल निवासी चंद्रप्रकाश चौधरी का भी इस इलाके में व्यापक जनाधार है। ऐसे में महतो वोट अपने पाले में करने के लिए ही जयप्रकाश पटेल का नाम आगे आया था। दरअसल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ उनकी तस्वीर आते ही इसका आकलन कर लिया गया था।

नेता प्रतिपक्ष के दावेदारों में कई और नाम भी हैं। इनमें सीपी सिंह, अनंत ओझा प्रमुख तो हैं पर जातिगत समीकरणों में भाजपा की मजबूरी अभी ओबीसी को अपने पाले में रखने की अधिक है। इसलिए पार्टी नेतृत्व की तरफ से उपस्थित शीर्ष नेताओं ने इनके नाम की वकालत करने वालों को भी सुना पर कोई फैसला नहीं लिया।

अंदरखाने से एक गुपचुप नाम हटिया विधायक का भी आगे बढ़ाने की कवायद हुई है। हटिया के भाजपा विधायक नवीन जयसवाल दरअसल पार्टी में नये हैं। वह आजसू से होते हुए झाविमो में गये थे और बाद में भाजपा में शामिल हो गये। इसलिए पार्टी के पुराने लोग उनकी विश्वसनीयता को अगंभीर मानते हैं। साथ ही यह दलील भी दी जा रही है कि क्या इस पार्टी में पुराने कार्यकर्ताओं की इतनी कमी हो गयी है कि दूसरे दलों से आने वालों को पार्टी में स्थान देने पर विचार हो रहा है। वैसे इस सोच में वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी शामिल नहीं हैं क्योंकि पार्टी छोड़ने के बाद भी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ उनका रिश्ता हमेशा ही कायम रहा था।