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मणिपुर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री को दूसरे तरीके से घेरा इंडिया ने

  • ओम बिड़ला ने प्रस्ताव स्वीकारने का एलान किया

  • सरकार की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा

  • प्रस्ताव पर बोलने के लिए मोदी को आना पडेगा

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः यह सभी जानते हैं कि भाजपा की सरकार प्रचंड बहुमत में है। इसलिए निचले सदन में लाये गये अविश्वास प्रस्ताव का सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बावजूद इसके विपक्ष मानता है कि सदन के भागे चल रहे प्रधानमंत्री को कमसे कम इस प्रस्ताव के मुद्दे पर तो सदन के सामने आना ही पड़ेगा। भारत की संसद ने विपक्षी दलों के गठबंधन द्वारा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के खिलाफ अविश्वास मत को अधिकृत किया है, ताकि हिंदू राष्ट्रवादी नेता को पूर्वोत्तर राज्य में जातीय संघर्ष के बारे में चिंताओं को विस्तार से संबोधित करने के लिए मजबूर किया जा सके।

मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पास संसद के 542 सीटों वाले निचले सदन में 301 सदस्यों का स्पष्ट बहुमत है, इसलिए अविश्वास मत से इसकी स्थिरता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसके बजाय विपक्ष, भाजपा शासित मणिपुर राज्य में हिंसा के बारे में बहस शुरू करना चाहता है, जिसमें मई की शुरुआत से लेकर अब तक 130 से अधिक लोग मारे गए हैं और 60,000 विस्थापित हुए हैं। विपक्ष के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए निचले सदन के अध्यक्ष ओम बिरला ने बुधवार को कहा कि वह जल्द ही तय करेंगे कि बहस और मतदान कब होगा। अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है, जैसा कि संसद के निचले सदन के रूप में जाना जाता है, यदि कम से कम 50 सदस्य इसका समर्थन करते हैं।

विपक्षी गठबंधन के सदस्यों में से एक, आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा ने कहा, भारत के संसदीय इतिहास में, संसद के भीतर बहस, संवाद और चर्चा के महत्वपूर्ण साधनों का प्रयोग किया जाता है, और यह परिणाम की परवाह किए बिना किया जाता है।

अविश्वास प्रस्ताव के मुद्दे पर विपक्ष का दावा है कि सरकार गिराना उनका मकसद नहीं है, प्रधानमंत्री संसद में जवाब देने के लिए बाध्य हैं। चूंकि उन्होंने अपना भाषण नहीं दिया, इसलिए उन्हें इस अविश्वास प्रस्ताव को लाने के लिए संसद में उपस्थित होने के लिए मजबूर होना पड़ा।

मणिपुर हिंसा इसी संदर्भ में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया था। कांग्रेस और के चंद्रशेखर राव की भारत राष्ट्र समिति (संसद मानसून सत्र) ने नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है। मणिपुर दो महीने से ज्यादा समय से हिंसा की आग में जल रहा है। वहां सैकड़ों लोग मारे गये। लगभग 50,000 लोग बेघर हैं।

ऐसे में भी विपक्ष केंद्र और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर सवाल उठा रहा है। संसद में उनके बयान की मांग कर रहे हैं। चूंकि प्रधानमंत्री ने अभी तक कोई बयान नहीं दिया है, इसलिए विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाने की राह पर है। मणिपुर पर मीडिया के सामने बयान देने के बाद भी नरेंद्र मोदी संसद के भीतर बयान देने से कन्नी काटते रहे हैं।

इसलिए भाजपा विरोधी इंडिया गठबंधन ने यह चाल चली है। सभी जानते हैं कि इस प्रस्ताव से सरकार नहीं गिरने जा रही है। संसदीय राजनीति में विपक्ष सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है। इसका मतलब है कि उन्हें सरकार पर भरोसा नहीं है। परिणामस्वरूप, सत्तारूढ़ दल को संसद में अपना बहुमत साबित करना पड़ता है।

यदि उन्हें बहुमत का समर्थन नहीं मिलता तो उन्हें सरकार से इस्तीफा देना पड़ता है। लेकिन लोकसभा में बहुमत होने पर सरकार को उखाड़ फेंकना संभव नहीं है। फिलहाल लोकसभा में जादुई आंकड़ा 272 है। इसमें से मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के पास 331 सीटें हैं। अकेले भाजपा की सीटों की संख्या 303 है। भाजपा विरोधी गठबंधन के पास 144 सीटें हैं। बीआरएस, वाईएसआरसीपी और नवीन पटनायक की बीजू जनता दल के पास कुल मिलाकर 70 सीटें हैं।

संसदीय लोकतंत्र में अविश्वास प्रस्ताव बहुत महत्वपूर्ण होता है। विपक्ष यह प्रस्ताव लाकर सरकार पर सवाल उठा सकता है। सरकार की विफलता को लोगों के सामने उजागर किया जा सकता है, संसद में इस पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है। अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष को एकजुट करने का भी काम करता है।

यदि संसद में अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है तो सरकार तुरंत गिर सकती है, ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री को भी इस्तीफा देना पड़ता है। संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार, लोकसभा के प्रति उत्तरदायी मंत्रिमंडल विपक्ष के विरुद्ध केवल लोकसभा में ही अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है, राज्यसभा में नहीं। लोकसभा में कोई भी पार्टी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है। सत्ता में बने रहने के लिए सरकार को उनके खिलाफ बहुमत साबित करना होगा।