आदिवासी और महतो के बीच नया समीकरण
आंदोलन में बराबर का शरीक था
राज्य गठन के बाद हाशिये पर गये
अब अधिकार रक्षा की आहट आने लगी
राष्ट्रीय खबर
रांचीः झारखंड की राजनीति में एक बार फिर से मूलवासियों—विशेषकर सदान समुदाय—के बीच राजनीतिक सुगबुगाहट और नए आंदोलन की आहट तेजी से सुनाई देने लगी है। राज्य गठन के शुरुआती दौर में हुए आंदोलनों पर यदि नजर डाली जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इन संघर्षों में केवल आदिवासी या महतो समुदाय ही शामिल नहीं था, बल्कि वे तमाम लोग भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे जो पीढ़ियों से झारखंड की इस माटी में रच-बस चुके हैं। मूल रूप से झारखंड में निवास करने वाले इन गैर-आदिवासी मूलवासियों को सदान की संज्ञा दी जाती है, जो आज भी राज्य के चुनावी परिदृश्य और वोट बैंक के लिहाज से सबसे मजबूत और निर्णायक ताकतों में गिने जाते हैं।
हालांकि, राज्य गठन के बाद की राजनीतिक उठापटक और परिस्थितियों के बीच मूलवासियों के हितों को मुखरता से उठाने वाला कोई सशक्त व एकजुट नेतृत्व सामने नहीं आ सका। नतीजा यह हुआ कि सदानों की आकांक्षाओं, उम्मीदों और अपेक्षाओं पर खरा उतरने वाला कोई सर्वमान्य नेता नहीं उभर पाया। जो राजनीतिक चेहरे सक्रिय भी रहे, वे ज्यादातर अपनी-अपनी जातियों या विशिष्ट वर्गों के संगठनों का ही झंडा ढोते नजर आए। इसके विपरीत, झारखंड की मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में हमेशा से आदिवासी और महतो समुदाय ही काबिज रहे।

वर्तमान परिदृश्य में यह स्थापित राजनीतिक माहौल तेजी से बदलता हुआ नजर आ रहा है। राजनीतिक दलों के जो पारंपरिक और स्थापित नेता हैं, वे सीधे तौर पर सदानों का एकछत्र प्रतिनिधित्व करते नहीं दिखते। इसके अलावा, सदानों के बीच भी मूलवासी पहचान को लेकर कोई सर्वमान्य और मजबूत नेता फिलहाल उभरकर सामने नहीं आया है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम हो चली है कि यह राजनीतिक शून्य बहुत जल्द भर सकता है। समाज के विभिन्न कोनों और चौपालों में अब यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि अलग झारखंड राज्य के निर्माण के लिए हुए लंबे आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होने के बावजूद अंततः सदानों के हाथ क्या लगा?
राजनीतिक हिस्सेदारी की बात करें तो, राजनीति की अगली पंक्ति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने वाले महतो समाज ने रामटहल चौधरी से लेकर सुदेश महतो तक को अपने बड़े और प्रभावी नेता के रूप में स्थापित किया। वर्तमान समय में भी प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जैसे अहम पद पर केशव महतो कमलेश आसीन हैं। ऐसे में, एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि महतो और आदिवासी समुदायों से इतर, बहुसंख्यक मूलवासी सदानों का राजनीतिक समर्थन आखिरकार किधर जाएगा?
अब तक यह सदान समाज मुख्य रूप से पारंपरिक जातिगत समीकरणों में बंटा हुआ था और इसके वोटों का एक बड़ा हिस्सा परंपरागत रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पक्ष में जाता रहा है। लेकिन हालिया दिनों में घटी कुछ अप्रत्यक्ष राजनीतिक घटनाओं ने सदानों को भाजपा के इस एकतरफा मोह से मुक्त होने का एक बड़ा अवसर प्रदान कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह खुला मैदान आने वाले समय में झारखंड की सियासत में एक नए और अप्रत्याशित राजनीतिक समीकरण को जन्म देने वाला साबित हो सकता है, जो आगामी चुनावों के नतीजों पर गहरा असर डालेगा।