भारत में पूंजीवाद लोकतंत्र के लिए संकट
पूंजीवाद का मूल चरित्र और सामाजिक अर्थ यही रहा है कि धन, संसाधन और निर्णय लेने की शक्ति समाज के मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सिमटकर रह जाए। इसका सीधा और घातक सामाजिक परिणाम यह होता है कि किसी देश की आम जनता इन्हीं चंद पूंजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों की कठपुतली बनकर रह जाती है। यह प्रयोग मानव इतिहास में कोई नया नहीं है; अनेक देशों में यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहा, कई में आंशिक, तो कई देशों में इसके विनाशकारी परिणाम सामने आए और यह बुरी तरह असफल हुआ।
इस सूक्ष्म अंतर और इसके दुष्परिणामों को सही ढंग से समझने के लिए निष्पक्ष इतिहास का अध्ययन आवश्यक है। दुर्भाग्य से, वह प्रामाणिक इतिहास केवल गंभीर और निष्पक्ष पुस्तकों में दर्ज है, जबकि आज के व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के दौर में भ्रामक प्रचार और सतही ज्ञान का बोलबाला है। अब मूल और ज्वलंत मुद्दे पर आते हैं। आज पूरा देश प्रत्यक्ष रूप से देख रहा है कि अमेरिकी विदेश नीति और सत्ता संरचना से जुड़ी ताकतवर हस्तियां सीधे मुंबई और गुजरात जैसे भारत के प्रमुख आर्थिक केंद्रों में कई-कई दिन बिता रही हैं।
यह उपस्थिति क्यों है और इसके पीछे अमेरिकी रणनीतिक हित क्या हैं, यह अब किसी से छिपा नहीं है। वेनेजुएला के संदर्भ में अमेरिकी हस्तक्षेप, सैन्य दबाव और वहां के तेल संसाधनों पर नियंत्रण की कोशिशों के बीच, अमेरिकी सरकार वहां के कच्चे तेल के प्रसंस्करण के लिए रिलायंस जैसी निजी भारतीय रिफाइनरियों का उपयोग करना चाहती है। व्यापारिक दृष्टि से दो निजी या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बीच समझौते में कोई वैधानिक त्रुटि प्रतीत नहीं हो सकती, लेकिन असली चिंता का विषय इसकी प्रक्रिया है।
जब किसी शक्तिशाली विदेशी राष्ट्र का प्रतिनिधि या मंत्री किसी देश में आकर सीधे चुनिंदा पूंजीपतियों से अमेरिका के राष्ट्रीय और आर्थिक हितों पर सीधी वार्ता करता है और इस पूरी प्रक्रिया में भारत की संप्रभु सरकार को एक तरफ किनारे कर दिया जाता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए एक अत्यंत गंभीर चेतावनी है। यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक व्यवस्था दोनों के लिए बेहद घातक है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा चुनी गई सरकार देश के नीतिगत और आर्थिक फैसलों की सर्वोच्च संरक्षक होती है। जब विदेशी ताकतें देश की चुनी हुई सरकार को दरकिनार कर सीधे निजी पूंजीपतियों के साथ अंतरराष्ट्रीय रणनीति तय करने लगती हैं, तो यह सीधे तौर पर देश की विदेश नीति और संप्रभुता का समर्पण है। लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि राष्ट्रीय संसाधनों को कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों के हाथों में सौंपा जा रहा है।
जब देश की पूरी अर्थव्यवस्था केवल दो-तीन बड़े कॉरपोरेट घरानों पर निर्भर हो जाती है, तो विदेशी ताकतें पूरे देश को ब्लैकमेल करने के बजाय केवल उन चंद पूंजीपतियों पर दबाव बनाकर पूरे देश की नीतियों को अपने पक्ष में मोड़ सकती हैं। अमेरिकी प्रतिनिधियों के दौरे के समय भारतीय राजनीतिक नेतृत्व या मंत्रियों से जुड़ी विवादित तस्वीरों का सार्वजनिक होना महज एक संयोग नहीं माना जा सकता।
यह पूंजीवादी ताकतों द्वारा दबाव बनाने और सत्ता को चुप रहने की हिदायत देने का एक पुराना हथकंडा रहा है। जब सत्ता पूंजी के बल पर टिकती है, तो वह ऐसी अंतरराष्ट्रीय ब्लैकमेलिंग के सामने असहाय हो जाती है। पूंजीपति वर्ग के साथ साठगांठ करके शासन चलाने वाले नेताओं को अक्सर यह भ्रम हो जाता है कि पूरी सत्ता उनके नियंत्रण में है। किंतु जब कोई बड़ी और विशाल साम्राज्यवादी पूंजीवादी ताकत सामने आती है, तब सत्ता में बैठे व्यक्तियों को एहसास होता है कि देश की वास्तविक आर्थिक और रणनीतिक कमान बहुत पहले ही उनके हाथों से निकल चुकी है।
यह भी समझना अत्यंत आवश्यक है कि रूबियो हों या डोनाल्ड ट्रंप, ये व्यक्ति स्वयं अमेरिकी पूंजीवाद की अंतिम शक्ति नहीं हैं; वे भी अमेरिका के विशाल मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स और कॉरपोरेट ढांचे के केवल प्रतिनिधि मात्र हैं। यदि वे भी तय पूंजीवादी लीक से हटकर चलने का प्रयास करेंगे, तो उनकी स्थिति भी डांवाडोल हो जाएगी। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की नींव काफी हद तक हथियारों के वैश्विक व्यापार और ऊर्जा क्षेत्र पर एकाधिकार पर टिकी हुई है।
यदि विश्व के अन्य देश अमेरिकी हथियारों पर अपनी निर्भरता समाप्त कर दें, तो अमेरिकी वर्चस्व की नींव डगमगा जाएगी। यदि इस अमेरिकी प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को चुनिंदा घरानों का गुलाम बना देगी, बल्कि भारत के बहुदलीय लोकतंत्र को एक ऐसे धनतंत्र में बदल देगी जहाँ नीतियां जनता के वोट से नहीं, बल्कि विदेशी और देशी पूंजीपतियों के गठजोड़ से तय होंगी। हमेशा यह याद रखना होगा कि कारखानों में चाहे कुछ भी बना लें, भोजन की रोटी तो खेतों से ही तैयार होगी।