Breaking News in Hindi

पच्चासी हजार वोटरों को अकारण हटा दिया गया

रिपोर्ट्स कलेक्टिव ने यूपी के वोटर लिस्ट का मामला निकाला

नई दिल्ली: 9 अक्टूबर को द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें यह उजागर किया गया था कि उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन – एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान भारत निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर ने राज्य के चुनाव अधिकारियों को बिना कोई कारण बताए 85,854 मतदाताओं का नाम हटाने वाले फॉर्मों पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया।  इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के कुछ ही मिनटों बाद, उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इस जांच को झूठ और गलत तथ्यों से भरा हुआ बताया और उस दिन के उत्तरार्ध में एक विस्तृत खंडन जारी करने की बात कही।

उसी शाम, नवदीप रिणवा ने एक रिकॉर्डेड वीडियो पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने खोजी रिपोर्ट को भ्रामक करार दिया। हालांकि, अपने इस वीडियो में रिणवा ने अनजाने में रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष की पुष्टि ही कर दी कि चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने यूपी के अधिकारियों को बिना कारण बताए 85,854 फॉर्म 7 (नाम हटाने वाले आवेदनों) पर हस्ताक्षर करने पर विवश किया था।

उन्होंने इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया कि क्यों अधिकांश ऑटो-जेनरेटेड फॉर्मों में मतदाताओं के नाम हटाने की वजह का उल्लेख नहीं था। उन्होंने इस निष्कर्ष का भी कोई जवाब नहीं दिया कि इनमें से कई फॉर्मों में नाम हटाने के कारण के स्थान पर A, N, H या E जैसे केवल एक अक्षर भरे गए थे। उल्लेखनीय है कि कानून और खुद भारत निर्वाचन आयोग के संशोधित नियमों के तहत मतदाता का नाम हटाने का स्पष्ट और तर्कसंगत कारण दर्ज करना अनिवार्य है।

इसके अलावा, रिणवा ने द कलेक्टिव के उस खुलासे को भी स्वीकार किया कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं को सामूहिक रूप से सूची से हटाने के 200 से अधिक प्रयास किए गए थे। हालांकि, उन्होंने इसे राज्य में एसआईआर प्रक्रिया की सफलता के प्रमाण के रूप में पेश किया और कहा कि यह संख्या कुल आबादी के मुकाबले नगण्य है। रिणवा ने कहा, इन फॉर्म 7 के जरिए कुल जितने नामों को हटाने की शिकायतें मिली थीं, उनकी संख्या केवल 4,700 के करीब थी। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में जहाँ 13.39 करोड़ मतदाता हैं, केवल 4,700 नाम ही ऐसे पाए गए जहाँ एक से अधिक फॉर्म 7 दाखिल किए गए थे।

उत्तर प्रदेश में फरवरी-मार्च के दौरान विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में, पश्चिम बंगाल की भांति, चुनावों के इतने करीब मतदाताओं के नामों का गलत तरीके से जोड़ा जाना या हटाया जाना गंभीर राजनीतिक प्रभाव रखता है। मतदाता सूचियों की गहन पड़ताल से पता चला है कि राज्य में जिस प्रकार की संदिग्ध गड़बड़ियां की गई हैं, वैसी किसी अन्य राज्य में नहीं देखी गईं।

पहली खोजी रिपोर्ट में उजागर हुआ था कि यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मतदाता सूची में जोड़े गए 16.18 लाख नए मतदाताओं का विवरण सार्वजनिक डोमेन से बाहर रखा था, जो कि पूरी तरह से गैर-कानूनी है। उस समय संपर्क किए जाने पर रिणवा ने कोई लिखित जवाब नहीं दिया था, लेकिन रिपोर्ट छपने के बाद उन्होंने इसे कानून और आयोग के निर्देशों के अनुरूप बताया। बाद में आयोग के आंतरिक निर्देशों की पड़ताल करने पर पाया गया कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने खुद आयोग के दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया था।

इस मामले पर चुनाव आयोग का केंद्रीय मुख्यालय शांत बना रहा और उसने यूपी सीईओ का बचाव नहीं किया। इसके विपरीत, 9 अक्टूबर को आयोग ने एक नया आदेश जारी कर किसी भी व्यक्ति द्वारा एक महीने में मतदाता हटाने के लिए 30 से अधिक आपत्तियां दर्ज कराने पर रोक लगा दी।

इस पड़ताल में यह भी सामने आया कि सॉफ्टवेयर इरोनेट द्वारा बिना कारण वाले फॉर्म दावे और आपत्तियों की समय सीमा समाप्त होने के बाद जेनरेट किए गए थे। अपने जवाब में सीईओ ने दावा किया कि इस प्रक्रिया में कोई अनियमितता नहीं थी क्योंकि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए, उन सभी को सुनवाई के लिए नोटिस भेजे गए थे।