सालाना रूदाली के लिए तैयार हो जाइए
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की हवा पिछले कुछ समय से जिस दयनीय दौर से गुजर रही है, वह किसी से छिपी नहीं है। बीते पूरे महीने यहां के बाशिंदों ने जैसे घुट-घुटकर सांस ली है। यदि हम ठंड के शुरुआती हफ्तों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति की भयावहता साफ समझ में आती है। महीने के अधिकांश दिन एयर क्वॉलिटी इंडेक्स यानी वायु गुणवत्ता सूचकांक 300 के पार ही बना रहा, जो सीधे तौर पर बेहद खराब श्रेणी में आता है।
कई दिन तो ऐसे रहे जब यह आंकड़ा 400 के खतरनाक स्तर को भी पार कर गया और हवा गंभीर श्रेणी में पहुंच गई। बमुश्किल कुछेक दिन ही ऐसे आए जब हवा की दिशा बदलने या तेज बहाव के कारण वायु गुणवत्ता में मामूली सुधार देखा गया और यह 300 से नीचे आया। ये आंकड़े केवल कुछ अंक नहीं हैं, बल्कि यह उस हकीकत का आईना हैं जो देश के दिल कहे जाने वाले शहर के लोगों को रोज भुगतनी पड़ रही है।
ऐसे विकट समय में देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट का इस पूरे प्रकरण पर खुद संज्ञान लेना अत्यंत आवश्यक और स्वागत योग्य कदम है। वैसे दीपावली का त्योहार आ रहा है। फिर से लोग पंजाब में पराली जलाने और पटाखा फोड़ने के लिए इसे जिम्मेदार ठहरायेंगे। लेकिन यह सवाल कभी सामने नहीं आयेगा कि जिनलोगों का वेतन जनता के पैसे से मिलता है, आखिर उनकी भी कोई जिम्मदारी बनती है अथवा नहीं।
आलीशान मकान और दफ्तरों के एसी कमरों में बैठकर ऐसे लोग जनता के हित की बात नहीं सोचते, यह स्थापित सत्य है। प्रदूषण के इस नासूर पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले राज्यों के प्राधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में एक ऐसी समयबद्ध और ठोस कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश दिया है, जिसे जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके। न्यायालय का यह तर्क पूरी तरह तार्किक है कि संकट की इस घड़ी में अधिकारी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते। प्रदूषण से पार पाने के लिए केवल कागजी घोड़े दौड़ाने के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना होगा और व्यावहारिक समाधान पर्यावरण विशेषज्ञों की सलाह पर ही आधारित होने चाहिए।
जब तक नीतियां स्पष्ट नहीं होंगी और उनकी जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक इस समस्या का कोई स्थाई हल निकल पाना असंभव है। हर साल सर्दियों की आमद के साथ ही दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का ग्राफ अचानक आसमान छूने लगता है, और इसके लिए दशकों से एक ही कारक को सबसे बड़ा खलनायक माना जाता रहा है—पराली जलाना।
लेकिन इस बार का परिदृश्य थोड़ा अलग और आंखें खोलने वाला है। इस बार तो ठंड की शुरुआत से ही नागरिकों को राहत का एक दिन भी नसीब नहीं हुआ। गौर करने वाली बात यह है कि इस सीजन में दिल्ली के कुल प्रदूषण में पराली के धुएं की हिस्सेदारी पांच प्रतिशत से भी बहुत कम दर्ज की गई है। इसके बावजूद हर बार सारा ठीकरा किसानों और पराली पर फोड़ देना न केवल अनुचित है, बल्कि वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने का एक आसान तरीका भी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली-एनसीआर जैसे महानगर में प्रदूषण के वास्तविक कारणों को समझने के लिए नए सिरे से शोध करने की सख्त जरूरत है। अगर हम कुछ साल पीछे मुड़कर देखें, तो सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फॉरकास्टिंग एंड रिसर्च और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई 2018 की प्रदूषण इन्वेंट्री रिपोर्ट बताती है कि राजधानी की हवा को जहरीला बनाने में सबसे बड़ा हाथ वाहनों का है।
उस रिपोर्ट के अनुसार, हवा में मौजूद खतरनाक सूक्ष्म कणों यानी पीएम 2.5 के लिए लगभग 41 प्रतिशत तक परिवहन व्यवस्था और करीब 21 प्रतिशत तक धूल जिम्मेदार थी, जो मुख्य रूप से अनियंत्रित निर्माण स्थलों और खुली सड़कों से उड़ती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में बहुत ही सटीक बात कही है कि पराली तो उस प्राचीन काल में भी जलाई जाती थी जब हमारे कवि और साहित्यकार स्वच्छ और नीले आसमान के गीत लिखा करते थे, तब तो हवा ऐसी जहरीली नहीं होती थी।
इसका सीधा अर्थ यह है कि समस्या केवल पराली की नहीं, बल्कि हमारी बदलती जीवनशैली, अनियोजित शहरीकरण और प्रशासनिक विफलताओं की है। राजनेताओं और हुक्ममों को इस गंभीर मुद्दे को अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने का अखाड़ा या अहंकार की लड़ाई नहीं बनाना। प्रयोग के तौर पर तमाम बड़े लोगों के घरों और दफ्तरों की एसी और दर्जनों गाड़ियों के चलने पर रोक का नतीजा देखा जा सकता है कि क्या इससे स्थिति में सुधार हो रहा है।