सुप्रीम कोर्ट का नियम बनाने का सरकार को निर्देश
आयु सीमा पर अधिक कड़ाई जरूरी है
सोशल मीडिया में बहुत कुछ उनके खिलाफ
सरकार इन कंपनियों को भी बाध्यकारी बनाएं
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने देश में बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते प्रभाव को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार से यह विचार करने को कहा है कि क्या नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया पर बनाए जाने वाले खातों को विनियमित करने के लिए कोई पुख्ता और सांविधिक (स्टेचूअरी) नियम बनाए जा सकते हैं।
न्यायालय ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि कैसे 12-13 साल के बच्चे आसानी से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अपने खाते खोल रहे हैं, जबकि भारतीय कानून के तहत नाबालिगों को किसी भी तरह का कानूनी अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) करने के योग्य नहीं माना जाता है। अदालत का यह स्पष्ट कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया मध्यस्थों को देश के कानूनों का पालन करना होगा और उनके सॉफ्टवेयर व नियम भारतीय कानूनी प्रावधानों के अनुरूप होने चाहिए।
यह पूरा मामला एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें यह तर्क दिया गया था कि भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 11 के तहत नाबालिगों द्वारा किए गए अनुबंध शुरुआत से ही शून्य होते हैं। इसके बावजूद तकनीकी कंपनियां बच्चों को अपनी सेवा की शर्तें स्वीकार करवाकर उनके साथ डिजिटल अनुबंध कर रही हैं, जो कानूनी रूप से सही नहीं है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह मांग की गई थी कि जब तक इस संबंध में स्पष्ट दिशानिर्देश या कानून नहीं बन जाते, तब तक 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर स्वतंत्र रूप से खाते खोलने से रोका जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह के नियम केवल सामान्य कार्यकारी दिशानिर्देशों तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि इन्हें आईटी नियमों के तहत उचित कानूनी या सांविधिक स्वरूप दिया जाना चाहिए ताकि उनका सख्ती से पालन कराया जा सके।
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार इस पूरे मुद्दे की गंभीरता को समझती है और इस पर विचार कर उचित कदम उठाएगी। आज के डिजिटल युग में जिस तरह से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया की लत, ऑनलाइन गोपनीयता के खतरों और अन्य सुरक्षा संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उसके मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बाल सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा और दूरगामी कदम मानी जा रही है। इस संभावित कानूनी बदलाव से आने वाले समय में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए भारत में नाबालिगों की पहुँच को लेकर कड़े नियम और आयु सत्यापन की प्रक्रिया लागू करना अनिवार्य हो सकता है।