जनता के बीच शुल्क कौन भरेगा का सवाल उभरा
राजनीतिक गोलबंदी और भाजपा की दुविधा
सोशल मीडिया की चाल और जमीनी हकीकत
त्योहार के मौसम में फंसे हुए मुखर प्रवक्ता
राष्ट्रीय खबर
रांचीः पूरे देश के साथ-साथ अब झारखंड की राजधानी रांची में भी यूपीआई ट्रांजैक्शन पर लगने वाले 0.4 प्रतिशत अतिरिक्त भुगतान के मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है। यह विषय वर्तमान में शहर के राजनीतिक गलियारों और आर्थिक चर्चाओं के केंद्र में आ चुका है। जैसे-जैसे डिजिटल भुगतान आम लोगों के जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है, इस तरह के अतिरिक्त शुल्क सीधे तौर पर मध्यम वर्ग, छोटे दुकानदारों और आम नागरिकों की जेब पर भारी पड़ते दिख रहे हैं।
एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के स्थानीय नेता एमएमडीआर यानी माइंस एंड मिनरल्स डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट के मुद्दे पर केंद्र सरकार के रुख के समर्थन में आक्रामक आंदोलन कर रहे हैं, वहीं आम जनता को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले यूपीआई शुल्क के मामले में उनका रुख रक्षात्मक नजर आता है। इस मुद्दे पर वे केवल सरकारी पक्ष का समर्थन करने की एक खानापूर्ति सी निभाते दिखते हैं।
रांची के प्रमुख चौक-चौराहों पर होने वाली राजनीतिक बहसों के दौरान जब कभी यह मुद्दा उठता है, तो वहां मौजूद भाजपा नेता अक्सर फोन पर बात करने का बहाना बनाकर स्थिति से कन्नी काट लेते हैं। इसके पीछे की मुख्य वजह यह है कि उनके पास इस बात का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं है कि इस अतिरिक्त शुल्क का वास्तविक बोझ कौन उठाएगा। क्या व्यापारी इसे अपनी जेब से भरेंगे या फिर अंततः इसकी पूरी वसूली आम जनता से ही की जाएगी? इस पशोपेश के कारण भाजपा के पास राजनीतिक तौर पर अपना बचाव करने और राज्य की हेमंत सोरेन सरकार की आलोचना करने की गुंजाइश काफी सीमित रह गई है।
ऐसा नहीं है कि भाजपा के समर्थक सोशल मीडिया पर पार्टी का पक्ष रखने में असमर्थ हैं, लेकिन उनके द्वारा किए जा रहे पोस्ट्स पर आने वाली तीखी और नकारात्मक प्रतिक्रियाएं उन्हें असहज कर रही हैं। इसके अलावा, एक ही तरह के बयानों और पोस्ट को जब पार्टी से जुड़े कई अलग-अलग लोगों द्वारा शेयर किया जाता है, तो यह जनता के बीच स्पष्ट हो जाता है कि इन संदेशों को किसी केंद्रीय स्तर पर तैयार किया गया है और स्थानीय नेता केवल इन्हें फॉरवर्ड करने की औपचारिकता निभा रहे हैं।
पारंपरिक रूप से भाजपा हर बड़े मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर मुखरता से अपना पक्ष रखती आई है। हालांकि, हालिया दिनों में यह परिपाटी कुछ हद तक कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि स्थानीय नेताओं को इस बात का स्पष्ट अंदाजा है कि यदि वे मीडिया के सामने आए, तो पत्रकारों द्वारा पूछे जाने वाले तीखे और तार्किक सवालों का जवाब देना उनके लिए मुश्किल साबित होगा।