परिवहन निगम के पास राज्य में काफी जमीन
राज्य की सरकारी परिवहन सेवा ठप है
सभी सरकारी बस स्टैंडों की अपनी जमीन
सरकारी बस सेवा बंदी का लाभ किन्हें मिला
राष्ट्रीय खबर
रांचीः झारखंड राज्य बनने के समय, लोगों को उम्मीद थी कि अपनी सरकार होने से यहां बेहतर सरकारी सेवाएं मिलेंगी, जिनमें एक कुशल सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था भी शामिल होगी। ‘झारखंड पथ परिवहन सेवा’ का गठन, राज्य भर में सरकारी बसों को चलाने की महत्वाकांक्षी योजना थी। लेकिन, जैसा कि अक्सर होता है, यह योजना शुरुआती चरण में ही दम तोड़ती हुई नज़र आई।
शुरूआत में, विफलता का ठीकरा परिवहन निगम की अव्यवस्था और बसों की खस्ता हालत पर फोड़ा गया। यह सच था कि निगम के पास संसाधन कम थे और बसें अक्सर मरम्मत की मांग करती थीं। लेकिन, अब यह स्पष्ट हो रहा है कि ये समस्याएं केवल ऊपरी सतह पर थीं। असली खेल कुछ और ही था। धीरे-धीरे, एक सरकारी परिवहन सेवा के गठन का विचार ही भुला दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि आज राज्य की पूरी परिवहन व्यवस्था पर निजी बस संचालकों का एकाधिकार है।
लेकिन, यह केवल एक खराब योजना का मामला नहीं है। असली मुद्दा इससे कहीं ज़्यादा गहरा और चिंताजनक है। बिहार के समय से ही, सरकारी बस सेवा के लिए रणनीतिक और प्राइम लोकेशन पर बड़े बस स्टैंड बनाए गए थे। जब झारखंड अलग राज्य बना, तो संपत्ति का विभाजन पूरी तरह से नहीं हो पाया। इसके चलते, कुछ समय तक बिहार राज्य पथ परिवहन निगम ही झारखंड में बस सेवाएं चलाता रहा।
अब, यह तस्वीर धीरे-धीरे साफ़ हो रही है कि इन तमाम सरकारी बस स्टैंडों की ज़मीन पर किसी और की गिद्ध दृष्टि है। यदि एक सक्रिय सरकारी परिवहन सेवा चालू रहती, तो इन संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने के बारे में सोचना भी असंभव होता। तर्क यह दिया जा सकता है कि चूंकि राज्य के पास अपनी बसें चलाने का कोई तंत्र नहीं है, इसलिए अब पूरे राज्य में इन खाली पड़े या अनुपयोगी सरकारी बस स्टैंडों की ज़मीन को निजी हाथों में सौंप दिया जाना चाहिए।
यही कारण है कि कई जगहों पर सरकारी बस स्टैंड के विशाल भवन आज खंडहर बन रहे हैं, जबकि उनकी देखभाल करने की ज़िम्मेदारी स्थानीय नगर निगमों की थी। जहां निगम सक्रिय हैं, वहां हालत थोड़ी बेहतर है, लेकिन बाकी जगहों पर यह स्थिति नहीं है। राजधानी रांची के स्टेशन रोड स्थित सरकारी बस स्टैंड को ही लें। इसके पीछे बना विशाल वर्कशॉप भी किसी पूंजीपति के लिए एक आकर्षक ज़मीन का टुकड़ा साबित हो सकता है।
इतने साल बीत जाने के बाद, यह राज धीरे-धीरे उजागर हो रहा है कि सरकारी परिवहन सेवा को जानबूझकर विफल किया गया, ताकि इन बहुमूल्य ज़मीनों को निजी हाथों में आसानी से सौंपा जा सके। क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता है, या इसके पीछे एक सोची-समझी साजिश है जो राज्य की बहुमूल्य संपत्ति को एक निजी सौदे में बदल देती है? यह सवाल झारखंड की जनता पूछ रही है और इसका जवाब जल्द मिलना चाहिए।