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न्यायपालिका के दोहरे मानदंड

भारतीय न्याय प्रणाली वर्तमान में एक ऐसे महत्वपूर्ण चौराहे पर खड़ी है, जहां संस्थागत पारदर्शिता, न्याय की निष्पक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे गंभीर सवाल राष्ट्रव्यापी बहस के केंद्र में हैं। हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने छठे राम जेठमलानी मेमोरियल व्याख्यान में न्यायपालिका की पारदर्शिता, सार्वजनिक भरोसे और आलोचना को स्वीकार करने की संस्कृति पर बहुत ही स्पष्ट विचार रखे। उन्होंने रेखांकित किया कि कोई भी संस्था खुद को आलोचना से परे रखकर जनता का विश्वास नहीं जीत सकती। न्याय का अर्थ केवल यह नहीं है कि निर्णय क्या आया, बल्कि यह है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संचालित हुई हो।

यह कोई नई बात नहीं है बल्कि अनेक न्यायविदों ने पहले भी जनता की परख की कसौटी पर न्यायपालिका के खरे उतरने की वकालत की है। अब दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिज स्वर्ण कांता शर्मा वनाम अरविंद केजरीवाल का विवाद अभी भले ही थम गया हो पर भविष्य में इसकी भी न्यायिक चर्चा होगी क्योंकि जिस तरीके से न्यायमूर्ति ने त्वरित कार्रवाई की थी, वह जनता के दिल में संदेह पैदा करने वाला साबित हुआ।  सीजेआई ने अपने संबोधन में यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में सुधार एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और संस्थाएं खुद को स्थिर रखकर गर्व महसूस नहीं कर सकतीं।

जनता का वास्तविक विश्वास तभी कायम होता है जब मुकदमा हारने वाला व्यक्ति भी यह मानकर लौटे कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष थी। हालांकि, जब हम सैद्धांतिक रूप से इन उच्च आदर्शों को देखते हैं, तो धरातल पर भारतीय न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली और मुकदमों की सुनवाई को लेकर कई पेचीदगियां सामने आती हैं। हाल के दिनों में दो ऐसे चर्चित मामले चर्चा में आए हैं जिन्होंने न्यायपालिका की प्रक्रिया, त्वरित न्याय के दावों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के असमान वितरण पर गंभीर वैचारिक और सामाजिक सवाल खड़े किए हैं।

एक तरफ हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन के दौरान कथित हिंसा और गंभीर मारपीट के आरोपी हिंदुवादी युवक स्वतंत्र भारद्वाज को दिल्ली की अदालत से तीन हफ्ते की अंतरिम जमानत मिल गई है। स्वतंत्र भारद्वाज पर एक पॉडकास्ट में खुलेआम हिंसा स्वीकार करने, सार्वजनिक रूप से मारपीट के दावे करने और गंभीर धाराओं (जिनमें एससी/एसटी एक्ट और पॉक्सो जैसे प्रावधानों से जुड़े विवाद भी शामिल हैं) के आरोप हैं। इसके बावजूद कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए उसे कुछ ही हफ्तों के भीतर अदालती राहत (अंतरिम जमानत) हासिल हो गई।

दूसरी तरफ, इसी देश की न्याय व्यवस्था के भीतर पिछले लगभग छह वर्षों (करीब 2190 से अधिक दिनों) से बिना किसी ठोस ट्रायल या दोषसिद्धि के जेल में बंद उमर खालिद का मामला है। उमर खालिद को यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत बिना मुक़दमे के सलाखों के पीछे रखा गया है। उनकी जमानत याचिकाएं लगातार लंबी तारीखों और अदालती विलंब का शिकार होती रही हैं। यह तुलनात्मक अंतर इस सवाल को बल देता है कि क्या एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जमानत का अधिकार हर नागरिक के लिए एक समान गति से काम कर रहा है?

जब एक तरफ हिंसा और अपराध के सार्वजनिक दावों के बावजूद किसी आरोपी को कुछ हफ्तों में राहत मिल जाती है, और दूसरी तरफ वैचारिक असहमति या राजनीतिक संशय के घेरे में बिना ट्रायल के एक युवा वर्षों तक जेल में सड़ता रहता है, तो यह स्थिति न्याय होते हुए दिखना चाहिए के बुनियादी सिद्धांत को आहत करती है। मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं स्वीकार किया है कि संस्थाएं अपनी आलोचना से डरती नहीं हैं और पारदर्शिता ही उनका एकमात्र वास्तविक आभूषण है।

परंतु यह पारदर्शिता केवल उच्च मंचों के भाषणों तक सीमित न रहकर जब तक निचली अदालतों और विचाराधीन कैदियों के मामलों में समानता के रूप में दिखाई नहीं देगी, तब तक जनसामान्य का विश्वास पूरी तरह मजबूत नहीं हो सकता। समय की मांग है कि न्यायपालिका अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली और जमानत देने के तौर-तरीकों में एकरूपता लाए, ताकि किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि या राजनीतिक पहुंच के आधार पर तय न हो, बल्कि केवल संविधान और कानून के दायरे में सुरक्षित रहे। दरअसल न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप ने इस स्तंभ को अंदर से इस कदर खोखला कर दिया है कि अब जज भी बिना शर्म लिहाज के अपने आका के पक्ष में काम करते नजर आते हैं। उन्हें पता है कि वर्तमान कानून में उनके खिलाफ कार्रवाई का कोई कानूनी आधार नहीं है। फिर भी नोट जलाने वाले घर के मालिक जस्टिस वर्मा का मामला एक उदाहरण है कि किस तरीके से न्यायपालिका का आचरण हो गया है। वहां भी सभी एक दूसरे की पीठ बचाने में जुटे हैं। जेन जेड का आंदोलन इस व्यवस्था के लिए भी एक चुनौती है।