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मुजफ्फरनगर के फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज का तेइसवां फैसला

एक और मामले में दोषियों को मृत्युदंड की सजा

इससे पहले बाइस को ऐसी सजा दे चुके हैं

ऐसे करीब सौ मामले उनसे वापस लिये गये

आदेश के बाद कहा सिर्फ ईश्वर से डरता हूं

राष्ट्रीय खबर

लखनऊः उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर स्थित फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने सोमवार को दहेज हत्या के एक संवेदनशील मामले में अभियुक्त को मृत्युदंड की सजा सुनाई। पिछले चार महीनों के भीतर उनके द्वारा दी गई यह 23वीं फांसी की सजा है। फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश दिवाकर ने एक भावुक टिप्पणी की और कहा कि वह किसी भी दबाव में काम करने के बजाय न्याय की रक्षा के लिए मृत्यु का वरण करना पसंद करेंगे, ताकि उन्हें कभी कायर न्यायाधीश न कहा जाए।

मामले में अदालत ने पत्नी की दहेज के लिए जलाकर हत्या करने के आरोपी नदीम को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 504 के तहत दोषी ठहराया और फांसी की सजा के साथ-साथ 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। सरकारी वकील कुलदीप कुमार के अनुसार, यह घटना 23 जुलाई 2018 की है, जब मुजफ्फरनगर के शाहपुर कस्बे में नदीम ने अपनी 23 वर्षीया पत्नी शहजादी पर दहेज की खातिर तेल छिड़क कर आग लगा दी थी। गंभीर हालत में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराई गई शहजादी ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था।

ट्रायल के दौरान मामले से जुड़े सभी 11 अभियोजन गवाह मुकर गए थे। इसके बावजूद, अदालत ने शहजादी के मृत्यु पूर्व दिए गए बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) को मुख्य आधार मानते हुए आरोपी को सजा-ए-मौत सुनाई। फैसले के दौरान न्यायाधीश दिवाकर ने कहा कि उनके माता-पिता ने उन्हें केवल ईश्वर से डरना सिखाया है। यदि कोई जज दबंगों, माफियाओं या अपराधियों के डर से फैसला सुनाने लगे, तो इससे न्यायपालिका पर जनता का विश्वास समाप्त हो जाएगा। उन्होंने खुलासा किया कि उन्हें माफियाओं और अपराधियों से लगातार धमकियां मिल रही हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अपराधियों को अनुचित लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से उनके कोर्ट से लगभग 100 गंभीर आपराधिक मामलों को स्थानांतरित (ट्रांसफर) कर दिया गया। अपनी सुरक्षा में कमी का जिक्र करते हुए न्यायाधीश ने वरिष्ठ अधिकारियों से पर्याप्त सुरक्षा की गुहार लगाई है।

गौरतलब है कि अगस्त के महीने में जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह के एक प्रशासनिक आदेश के तहत दिवाकर की अदालत से हत्या के लगभग 100 मामले दूसरी अदालत में स्थानांतरित कर दिए गए थे। बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी के अनुसार, वकीलों और पक्षकारों में फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट द्वारा लगातार मृत्युदंड दिए जाने की आशंकाओं के चलते यह कदम उठाया गया था।