ग्रीनलैड के अलगाव का असर समुद्री जलस्तर पर
मैनहट्टन के जितना आकार में बड़ा
उपग्रह से यह घटना रिकार्ड की गयी
जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ रहा है
राष्ट्रीय खबर
रांचीः यूरोप के कोपरनिकस सेंटिनल-1 मिशन ने उत्तर-पश्चिम ग्रीनलैंड में स्थित पिटरमैन ग्लेशियर में एक बड़े बदलाव को रिकॉर्ड किया है। 4 अगस्त 2026 को इस ग्लेशियर की तैरती हुई बर्फ की जीभ का 76 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा टूटकर अलग हो गया। वर्ष 2012 के बाद पिटरमैन ग्लेशियर से तैरती बर्फ का यह सबसे बड़ा नुकसान है और 2020 के बाद से पूरे आर्कटिक क्षेत्र में दर्ज की गई बर्फ टूटने की सबसे बड़ी घटना है। यह घटना दर्शाती है कि पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों में परिस्थितियाँ कितनी तेजी से बदल रही हैं।
नया बना यह चपटा हिमखंड, जिसे आइस आइलैंड भी कहा जाता है, लगभग अमेरिका के मैनहट्टन शहर के बराबर बड़ा है और इसकी मोटाई 150 मीटर तक हो सकती है। 3 अगस्त को सेंटिनल-1 द्वारा ली गई रडार तस्वीरों में बर्फ की जीभ के मध्य भाग में भारी क्षरण देखा गया था। ठीक एक दिन बाद, 4 अगस्त को यह विशालकाय आइस आइलैंड ग्लेशियर के पूर्वी हिस्से से पूरी तरह अलग हो गया। सेंटिनल-1 उपग्रह ध्रुवीय ग्लेशियरों की निगरानी के लिए बेहद उपयोगी है क्योंकि इसके रडार उपकरण दिन-रात और घने बादलों के पार भी तस्वीरें ले सकते हैं।
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वर्ष 2019 से कनाडाई और ब्रिटिश विश्वविद्यालयों की एक अंतरराष्ट्रीय शोध टीम ईएसए के फ्यूचरईओ आर्कटेक्स प्रोजेक्ट के तहत सेंटिनल-1 डेटा का उपयोग करके पिटरमैन ग्लेशियर की निगरानी कर रही है। शोधकर्ताओं ने पाया कि ग्लेशियर में दरारें महीनों से बढ़ रही थीं। अप्रैल में ली गई तस्वीरों में भी आंतरिक खिंचाव और दरारों का पता चला था।
यूनिवर्सिटी ऑफ स्टर्लिंग की शोधकर्ता अन्ना क्रॉफर्ड के अनुसार, आर्कटिक में ऐसे विशालकाय आइस आइलैंड बहुत दुर्लभ होते हैं। इनका अध्ययन करके वैज्ञानिकों को ध्रुवीय बर्फ के पिघलने, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और समुद्री पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में मदद मिलेगी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पिटरमैन ग्लेशियर पर अभी भी दो और बड़ी दरारें मौजूद हैं, जिससे आने वाले समय में 97 वर्ग किमी और 87 वर्ग किमी के दो और हिमखंड टूटकर अलग हो सकते हैं।
इस घटना से आर्कटिक में समुद्री जहाजों और तेल/गैस इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भी जोखिम पैदा हो गया है। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन कनाडा इस हिमखंड के रास्ते पर लगातार नजर रख रहा है। इतने विशाल हिमखंड समुद्र में सालों तक बने रहते हैं और धीरे-धीरे छोटे टुकड़ों में टूटते हैं, जिन्हें ट्रैक करना और भी कठिन हो जाता है।
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