Breaking News in Hindi

देश के बैंकों का असली खेल अब आरटीआई के खुल गया है

अमीरों के लिए छूट पर गरीबों पर कठोर नियम

सेंट्रल बैंक के आंकड़ों से खुलासा हुआ

लोक रिकवरी में भिन्न व्यवहार हुआ

अमीरों का कर्ज बट्टे खाते में डाला

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से प्राप्त एक राइट टू इंफॉर्मेशन जवाब ने यह उजागर किया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अपने छोटे उधारकर्ताओं और बड़े डिफ़ॉल्टरों के साथ किस तरह का अलग-अलग व्यवहार करते हैं। सजग नागरिक मंच के अध्यक्ष और पुणे के आरटीआई कार्यकर्ता विवेक वेलणकर द्वारा दायर आवेदन के जवाब में यह जानकारी सामने आई है।

बैंक के स्वयं के आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2025-26 तक के 10 वर्षों के दौरान, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने 100 करोड़ से अधिक के बड़े डिफ़ॉल्टरों के 26,701.55 करोड़ के ऋण राइट ऑफ किए। इस बड़ी राशि में से बैंक केवल 3,874.41 करोड़ ही वसूल कर सका, जो लगभग 14.5 फीसद की रिकवरी दर है। इसका मतलब है कि बड़े उधारकर्ताओं की 85 फीसद से अधिक राइट-ऑफ राशि अब भी अकी वसूल नहीं हो सकी है।

इसके विपरीत, बैंक ने 1 लाख या उससे कम के छोटे उधारकर्ताओं के साथ अलग रुख अपनाया। इसी अवधि के दौरान बैंक ने छोटे ऋणों में 6,774.23 करोड़ राइट-ऑफ किए, लेकिन इनमें से 5,004.28 करोड़ की वसूली की, जो लगभग 74 फीसद की रिकवरी दर है।

जब श्री वेलणकर ने बैंक से 100 करोड़ से अधिक के राइट-ऑफ वाले डिफ़ॉल्टरों के नाम और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के जरिए दिए गए ऋण छूट की जानकारी मांगी, तो बैंक ने यह कहते हुए मना कर दिया कि यह जानकारी तीसरे पक्ष  से संबंधित है।  विवेक वेलणकर ने कहा कि बैंक छोटे डिफ़ॉल्टरों के नाम अखबारों में छापकर उन्हें सार्वजनिक रूप से नीलाम या शर्मिंदा करते हैं और उनके घर जब्त करते हैं, लेकिन बड़े कॉर्पोरेट डिफ़ॉल्टरों के मामले में राइट-ऑफ करके और उनके नाम छिपाकर नरम रुख अपनाते हैं। उन्होंने इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्रीय वित्त मंत्रालय को भी मूकदर्शक बने रहने का जिम्मेदार ठहराया।