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नौकरी के असली सवाल से डरती सरकार

भारत की वर्तमान राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों में यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सत्ताधारी दल या सरकार की यह पुरानी और सुनियोजित नीति रही है कि देश की मूल, गंभीर और बुनियादी समस्याओं से आम जनता का ध्यान भटकाकर उसे किसी अन्य दिशा में मोड़ दिया जाए। इस रणनीति के तहत विभिन्न वैचारिक और राजनीतिक हथकंडों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें हिंदू-मुसलमान का मुद्दा या ध्रुवीकरण का फॉर्मूला सबसे अधिक आजमाया गया और एक समय तक राजनीतिक रूप से काफी कारगर भी साबित हुआ।

हालांकि, जैसे-जैसे समय बीतता गया है, अब यह पुराना तरीका भी धीरे-धीरे विफल और बेअसर होता जा रहा है। विशेष तौर पर, राम मंदिर निर्माण से जुड़े विभिन्न घोटालों और चंदा चोरी जैसे विवादों के सामने आने के बाद से, भारतीय जनता पार्टी या सत्ता पक्ष की हर बात का आंख बंदकर समर्थन करने वाले वर्ग में भी यह वैचारिक समझ और चेतना धीरे-धीरे विकसित होने लगी है कि व्यवस्था में सब कुछ वैसा नहीं है जैसा प्रचारित किया जाता है। इस वैचारिक बदलाव के कारण अब देश का आम नागरिक धीरे-धीरे अपनी मूल और असली समस्याओं की तरफ ध्यान देने के लिए मजबूर होने लगा है।

यदि पूरे देश के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए, तो आज के समय में सबसे प्रमुख, विकट और गंभीर समस्या रोजगार की ही है। आज का युवा वर्ग अपनी आजीविका और भविष्य को लेकर सबसे अधिक चिंतित है। एक विस्तृत सर्वेक्षण से प्राप्त उत्तरों ने आज की युवा पीढ़ी की गहरी आकांक्षाओं, मानसिक प्राथमिकताओं और उनके सपनों का एक स्पष्ट और विस्तृत विजन दुनिया के सामने रखा है। सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, इसमें शामिल लगभग 70 प्रतिशत उत्तरदाताओं—जिनमें महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या थोड़ी अधिक थी—ने यह स्पष्ट रूप से साझा किया कि वे बाजार में उपलब्ध किसी भी साधारण या कम वेतन वाली नौकरी से समझौता करने के बजाय शुरुआत से ही एक ऐसे स्पष्ट और सुनियोजित करियर मार्ग की तलाश कर रहे हैं जो उन्हें उनके आदर्श और दीर्घकालिक करियर पथ पर मजबूती से स्थापित कर सके।

इन युवाओं के करियर लक्ष्यों का मुख्य और सर्वोपरि केंद्र एक स्थायी वेतनभोगी (सैलेरीड) या संगठित औपचारिक क्षेत्र की नौकरी प्राप्त करना था। इस संदर्भ में एक बेहद दिलचस्प बात यह सामने आई कि साक्षात्कार में शामिल महिला नौकरी चाहने वालों में से एक बहुत बड़ा और भारी हिस्सा इन वेतनभोगी और स्थिर पदों की तीव्र आकांक्षा रखता था, जबकि उनमें से केवल 14 प्रतिशत महिलाओं ने ही स्वरोजगार करने या खुद का कोई काम शुरू करने की इच्छा व्यक्त की। इसके बिल्कुल विपरीत, पुरुष उत्तरदाताओं में रुझान और प्राथमिकताएं कुछ अलग रूप में देखी गईं, जहां लगभग एक तिहाई से अधिक पुरुष अपना खुद का नया उद्यम या व्यवसाय शुरू करने की प्रबल इच्छा रखते थे।

इसके अलावा, पारंपरिक रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की सरकारी नौकरियों के प्रति समाज में जो एकतरफा और भारी झुकाव का आख्यान प्रचलित है, उसके बिल्कुल विपरीत इस सर्वेक्षण में यह चौकाने वाली बात सामने आई कि इन युवा पुरुषों और महिलाओं दोनों का एक बहुत बड़ा, तुलनीय और महत्वपूर्ण हिस्सा निजी क्षेत्र (प्राइवेट सेक्टर) में बेहतरीन अवसरों की तलाश कर रहा था और उसी के अनुरूप अपनी तैयारी कर रहा था। यह पूरी आर्थिक और सामाजिक सोच ऐसे समय में और अधिक तेजी से पनप रही है जब देश के राजनीतिक गलियारों में एक अलग ही उथल-पुथल मची हुई है।

यह वह दौर है जब कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन और विभिन्न जन-सरोकारों से जुड़े मुद्दों ने देश की आम जनता के एक बड़े बहुमत को सरकार और विशेष रूप से दिल्ली के जंतर-मंतर पर पुलिस द्वारा की गई दमनात्मक और अनुचित कार्रवाई के कारण बेहद नाराज कर दिया है। देश के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और अन्य शीर्ष नेता जनता के बीच उठ रहे इन कड़वे और तीखे सवालों से बचने के लिए लगातार कतराते और भागते फिर रहे हैं। इसके बावजूद, आम जनता की आजीविका, सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े ये बुनियादी सवाल आज भी अपनी पूरी ताकत के साथ अपनी जगह पर जस के तस खड़े हैं। इन तमाम राजनीतिक उठापटक और युवाओं की रोजगार से जुड़ी अंतहीन उम्मीदों के बीच यह साफ हो चुका है कि जब तक देश के नीति निर्माता शहरी और ग्रामीण युवाओं की इन वास्तविक प्राथमिकताओं और उनकी गहरी आकांक्षाओं को पूरी ईमानदारी से नहीं समझेंगे, तब तक किसी भी खोखले दावे या सतही नारे से देश की मूल समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता है। जाहिर है कि असली समस्याओँ के सामने आने की वजह से अब मोदी सरकार की चुनौतियां कठिन होती जा रही है।