वर्ष 1957 मॉडल की साइकिल का सम्मान
सत्तर साल से संभालकर रखा था इसे
किसी ने इसे साइकिल को चुरा लिया
अब सारे लोग इसे खोजने में जुटे हैं
राष्ट्रीय खबर
चेन्नईः तमिल फिल्म मेयाझगन हमें याद दिलाती है कि एक पुरानी साइकिल सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि कृतज्ञता, स्मृतियों और विरासत का प्रतीक होती है। कोच्चि के कलमस्सेरी निवासी 80 वर्षीय एम.बी. प्रकाशन के लिए उनकी 1957 मॉडल की रैले हम्बर साइकिल भी कुछ ऐसी ही भावनाएं समेटे हुए थी। यह साइकिल उन्हें उनके पिता ने तोहफे में दी थी, जिसे उन्होंने करीब 70 वर्षों तक एक पवित्र धरोहर की तरह सहेज कर रखा। प्रकाशन के पिता ने उन्हें इसे न बेचने और न खराब करने की हिदायत दी थी। प्रकाशन ने तीन दशकों तक इस वादे का पालन किया, लेकिन उनके पिता की 23वीं पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर एक चोर उनकी इस अनमोल निशानी को चुरा ले गया। प्रकाशन के लिए यह केवल लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि उनके पिता का साया थी। उन्होंने भावुक होकर कहा, लोग पूछते हैं कि मैं एक पुरानी साइकिल के लिए इतना दुखी क्यों हूं? उनके लिए यह कबाड़ हो सकती है, लेकिन मेरे लिए यह मेरे पिता हैं, जिन्हें मैंने दोबारा खो दिया है।
इस घटना ने स्थानीय लोगों को झकझोर दिया है। प्रकाशन का कहना है कि वे इस दुख से उबर नहीं पा रहे हैं। उनकी इस भावना को देखते हुए, क्षेत्र में इस साइकिल को खोजने के लिए एक व्यापक जन-अभियान शुरू हो गया है। कोच्चि के लोग अब उनकी साइकिल को ढूंढने में मदद कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर काफी सक्रियता देखी जा रही है।
प्रकाशन ने साइकिल वापस दिलाने वाले व्यक्ति के लिए 5 लाख रुपये का भारी इनाम भी घोषित किया है। अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए, जब वे मट्टनचेरी से थुप्पुमपाडी स्थित सेंट सेबेस्टियन स्कूल तक 7 किलोमीटर से अधिक पैदल चलकर जाते थे, उन्होंने बताया कि कैसे उनके पिता के संघर्ष ने उन्हें यह साइकिल दिलाई थी। फिलहाल, पुलिस इस चोरी के मामले की जांच कर रही है और उम्मीद की जा रही है कि भावनात्मक मूल्य रखने वाली यह साइकिल जल्द ही वापस मिल जाएगी। पूरा इलाका इस बुजुर्ग की भावना का सम्मान करते हुए इस साइकिल तलाश अभियान में जुट गया है, जो मानवीय संवेदनाओं की एक मिसाल बन गई है।