घोटालों के खिलाफ वोट देकर बड़े घोटालों में फंसे हैं
वर्ष 2014 में कांग्रेस को दिल्ली की सत्ता से बेदखल करने के पीछे सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार था। भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपना चेहरा बनाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ ऑल आउट लड़ाई का वादा किया था। पार्टी ने स्वयं को पार्टी विद ए डिफरेंस (एक अलग तरह की पार्टी) के रूप में प्रचारित किया। जनता ने भगवा शिविर पर भरोसा जताया और लगातार तीन बार सत्ता सौंपी।
प्रधानमंत्री मोदी का वह बयान—न खाऊंगा, न खाने दूंगा—आज भी सोशल मीडिया पर गूंजता है। लेकिन भाजपा नेतृत्व के इन खोखले दावों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। यह अलग बात है कि जिस सीएजी विनोद राय ने टेलीकॉम और कोयला घोटाले के आरोप लगाये थे, वे बाद में संघ के आदमी साबित हुए और मोदी सरकार से लाभ भी लिया।
भाजपा ने श्रीराम चंद्र के कंधे पर बंदूक रखकर केंद्र से लेकर राज्यों तक सत्ता हासिल की है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण ही इस पार्टी के विस्तार का मुख्य आधार रहा है, लेकिन विडंबना देखिए कि उसी राम मंदिर में अब चोरों और लुटेरों ने सेंध लगा दी है। आरोप है कि वहां न केवल बड़ी मात्रा में नकदी, बल्कि रामलला के आभूषणों तक की चोरी हुई है।
बुलडोजर बाबा के राज्य में इस अभूतपूर्व घोटाले की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि पवित्र चारधाम से भी आंखें खोल देने वाली खबरें सामने आ गईं। अब उत्तराखंड का बद्रीनाथ मंदिर भी विवादों के घेरे में है। आरोप है कि वहां भी अयोध्या की तर्ज पर ही चढ़ावे के पैसों की चोरी हुई है। इन दो डबल इंजन सरकारों वाले राज्यों में विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च में होने हैं, ऐसे में चुनावी ढोल बजने से ठीक पहले इन घोटालों ने राष्ट्रीय राजनीति में भूचाल ला दिया है।
यह मात्र संयोग नहीं है कि जिन धर्मस्थलों के नाम पर भाजपा वोट मांगती है और सरकारें बनाती है, वहीं इस तरह का पापाचार देखने को मिल रहा है। यह साबित करता है कि भाजपा के लिए धर्म केवल राजनीति का एक माध्यम है। स्वामी विवेकानंद या अन्य महापुरुषों के धर्म संबंधी विचारों का सम्मान करना तो दूर, भाजपा नेतृत्व की यह संकीर्णता भारत की धार्मिक भावना और हिंदू धर्म की गरिमा को ही धूमिल कर रही है।
घोटाले केवल धर्मस्थलों तक ही सीमित नहीं हैं। भाजपा शासित मध्य प्रदेश में भी घोटालों की एक लंबी श्रृंखला सामने आई है। मुख्यमंत्री मोहन यादव पर जमीन घोटाले के आरोप लगे हैं, तो वहीं मोदी कैबिनेट के महत्वपूर्ण सदस्य और कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी का नाम भी विवादों में है। आरोप है कि उन्होंने कृषि मंत्रालय की एक सब्सिडी योजना का लाभ अपने ही फार्म को दिलाया है।
वहीं दूसरी ओर, दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था के भीतर के भ्रष्टाचार ने तो हदों को पार कर दिया है। दिल्ली सरकार के अधीन अस्पतालों में करीब 15 हजार बिस्तर हैं, लेकिन उनके लिए 16.5 लाख चादरें खरीदी गईं! वह भी 150 रुपये वाली चादर 450 रुपये की दर से। ओआरएस का एक पैकेट बाजार में 15 रुपये में मिलता है, लेकिन सरकार ने उसे 205 रुपये प्रति पैकेट के हिसाब से खरीदा।
एक पोर्टेबल एक्स-रे मशीन की बाजार कीमत करीब 10 लाख रुपये है, जिसे सरकार की सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी ने 33 लाख रुपये में खरीदा। ऐसी एक-दो नहीं, 448 मशीनें खरीदी गईं। यानी 45 करोड़ के बदले 148 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। इसी तरह, रेडियोलॉजिकल उपकरणों की कीमत 25 लाख रुपये थी, लेकिन सरकार ने उसके लिए 1.10 करोड़ रुपये चुकाए।
नया भ्रष्टाचार का केंद्र बना है व्यापम घोटाले के लिए कुख्यात मध्य प्रदेश। वहां 1200 करोड़ रुपये का 5 लाख टन चावल घोटाला सामने आया है। एफसीआई गोदामों का वह चावल, जो गरीबों की भूख मिटाने के लिए था, उसे निजी इथेनॉल कारखानों में इस्तेमाल के नाम पर खपा दिया गया।
हालांकि, खाद्य मंत्रालय ने इस मामले में एफसीआई के एक बड़े अधिकारी समेत पांच लोगों को निलंबित कर दिया है और एसआईटी जांच कर रही है, लेकिन ये कार्रवाई नाकाफी है। अतीत में भी ऐसी जांचों का नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है। राजनीति का अपराधीकरण और उच्च स्तर पर मिलीभगत के बिना यह भ्रष्टाचार संभव नहीं है।
जनता अब यह समझ चुकी है कि सरकारें बदलने से देश की तकदीर नहीं बदलती। यह घोर निराशाजनक है कि इस देश में व्यवस्था के इस बिल्ली के गले में घंटी बांधने वाला कोई मजबूत नेतृत्व अभी तक उभर कर नहीं आया है, जबकि इससे देश को जो नुकसान हो रहा है, वह अपूरणीय है। दरअसल जिस मोदी को मजबूत नेतृत्व समझा गया था, वह भी दरअसल चंद पूंजीपतियों का हित साधने वाले नेता ही साबित हो गये हैं।