वैश्विक मीडिया की नजर में भारतीय नेतृत्व
समकालीन वैश्विक राजनीति में भारत की स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरफ जहां देश आर्थिक और रणनीतिक मोर्चे पर नई ऊंचाइयों को छू रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय लोकतांत्रिक परंपराओं और नेतृत्व की शैली को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी बहस छिड़ी हुई है। इस बहस के केंद्र में है—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रेस कॉन्फ्रेंस न करना।
हाल के दिनों में यह मुद्दा केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पश्चिमी मीडिया ने भी इस पर पैनी नजर रखनी शुरू कर दी है और इसे भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी कमजोरी के रूप में रेखांकित किया जा रहा है। भारत में पिछले एक दशक से विपक्ष और नागरिक समाज लगातार यह सवाल उठाता रहा है कि प्रधानमंत्री खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों के तीखे सवालों का सामना क्यों नहीं करते।
समय बदलने के साथ अब इस मुद्दे ने अंतरराष्ट्रीय रूप ले लिया है। हाल के वर्षों में जब भी प्रधानमंत्री विदेशी दौरों पर जाते हैं, तो वहां की मीडिया और प्रेस क्लबों में यह सवाल प्रमुखता से उठता है। पश्चिमी मीडिया का तर्क है कि लोकतंत्र में जवाबदेही केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से जनता के सवालों का सामना करना भी नेतृत्व की जिम्मेदारी है।
कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय अखबारों और खोजी वेबसाइटों ने इस बात पर चिंता जताई है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेता संस्थागत मीडिया से दूरी बनाकर चल रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरों के दौरान प्रवासी भारतीयों के भव्य कार्यक्रम हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहे हैं।
हालांकि, हालिया विदेशी दौरों के दौरान पश्चिमी मीडिया ने इन कार्यक्रमों की अंदरूनी हकीकत को लेकर कई गंभीर खबरें दिखाई हैं। विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि स्टेडियमों में भीड़ जुटाने के लिए चार्टर्ड फ्लाइट्स के जरिए बाहरी लोगों को लाया गया था ताकि एक कृत्रिम प्रभाव पैदा किया जा सके।
विदेशी विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह की स्टेडियम डिप्लोमेसी का उद्देश्य एक ऐसी छवि का निर्माण करना है जो यह दिखाए कि वैश्विक स्तर पर नेतृत्व को भारी जनसमर्थन प्राप्त है। लेकिन जब यही नेतृत्व वहां की स्थानीय या अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने आने से कतराता है, तो इस भव्यता पर सवाल उठने लाजमी हो जाते हैं। इस पूरे विवाद और आलोचनाओं के बीच विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी की दलील ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। अधिकारी के अनुसार:
भारतीय जनता अपने नेता के साथ सीधा संवाद पसंद करती है। जनता ऐसी बातों को पसंद नहीं करती जो कई माध्यमों से होकर उन तक पहुंचती हैं। इसीलिए खुद नरेंद्र मोदी सीधे जनता से संवाद करते हैं। इस दलील के पीछे मन की बात, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और सार्वजनिक रैलियों का हवाला दिया जाता है, जहां प्रधानमंत्री बिना किसी मध्यस्थ के अपनी बात देश के सामने रखते हैं।
विदेश मंत्रालय की इस दलील की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जबरदस्त आलोचना हो रही है। राजनीतिक विश्लेषकों और वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता संगठनों ने इस तर्क को लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत बताया है। इसके पीछे मुख्य रूप से तीन तर्क दिए जा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि रेडियो, सोशल मीडिया या रैलियों के जरिए किया जाने वाला संबोधन सीधा संवाद नहीं बल्कि एकतरफा प्रसारण है।
इसमें जनता या पत्रकारों को पलटकर सवाल पूछने या सरकार के दावों की पड़ताल करने का कोई मौका नहीं मिलता। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। यह तर्क देना कि जनता माध्यमों से छनकर आने वाली बातें पसंद नहीं करती, एक तरह से स्वतंत्र पत्रकारिता की प्रासंगिकता और उसकी विश्वसनीयता को खारिज करने जैसा है।
पश्चिमी मीडिया का मानना है कि सीधे संवाद के नाम पर प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचना दरअसल असहज करने वाले सवालों (जैसे- बेरोजगारी, मानवाधिकार, और आर्थिक नीतियां) से बचने का एक सुरक्षित रास्ता है। एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में भारत की साख केवल उसकी आर्थिक और सैन्य ताकत पर ही नहीं, बल्कि उसके लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती पर भी टिकी है।
पश्चिमी मीडिया द्वारा इस मुद्दे को लगातार उठाए जाना यह दर्शाता है कि दुनिया भारत के आंतरिक लोकतांत्रिक ताने-बाने को कितनी बारीकी से देख रही है। सीधे संवाद की दलील घरेलू स्तर पर राजनीतिक रूप से भले ही प्रभावी लगती हो, लेकिन वैश्विक मंच पर इसे एक स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा के रूप में स्वीकार करना मुश्किल हो रहा है।
अंततः, एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान इस बात से होती है कि उसका नेतृत्व तीखे और आलोचनात्मक सवालों का सामना करने के लिए कितना तैयार है। अब जाहिर है कि संसद के मॉनसून सत्र में भी देश के भीतर और विदेशी दौरे के दौरान चर्चा में आयी बातों पर भी विपक्षी सवालों के लिए सरकार को तैयार रहना चाहिए क्योंकि सदन के अंदर गर्मी होने वाली है।