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सेवानिवृत्त आरटीओ के ठिकानों पर छापा पड़ा

यूपी में योगी सरकार का भ्रष्टाचार पर बड़ा एक्शन

  • कई एजेंसियों की संयुक्त छापामारी

  • कई शहरों में एक साथ धावा बोला

  • फर्जी कंपनियों का पता भी चला है

राष्ट्रीय खबर

लखनऊः उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनाई गई जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत एक सेवानिवृत्त सहायक क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी के ठिकानों पर की गई विजिलेंस और आयकर विभाग की संयुक्त छापेमारी ने राज्य की सियासत को पूरी तरह गरमा दिया है। इस बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई के बाद उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।

विजिलेंस और आयकर विभाग की टीमों ने अधिकारी के विभिन्न शहरों (जैसे लखनऊ, कानपुर और प्रयागराज) में स्थित आवासीय और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर एक साथ दबिश दी। सरकारी और जांच एजेंसियों के सूत्रों द्वारा किए जा रहे दावों के अनुसार, इस छापेमारी में अधिकारी और उनके परिजनों के नाम पर दर्ज कई आलीशान बंगलों, जमीनों और व्यावसायिक संपत्तियों के दस्तावेज मिले हैं। शेयर बाजार, रियल एस्टेट और विभिन्न फर्जी कंपनियों में करोड़ों रुपये के बेनामी निवेश के पुख्ता सबूत हाथ लगे हैं। ठिकानों से भारी मात्रा में बेहिसाब नकदी और सोने-चांदी के जेवरात बरामद किए गए हैं, जिनका मिलान अधिकारी के वैध आय स्रोतों से नहीं हो रहा है।

सरकार के समर्थकों और भाजपा नेताओं का साफ कहना है कि यह कार्रवाई इस बात का जीवंत प्रमाण है कि वर्तमान शासन में किसी भी भ्रष्टाचारी को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे उसका रसूख या प्रभाव कितना भी बड़ा क्यों न हो।

इसके विपरीत, इस कार्रवाई पर मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं कि उत्तर प्रदेश में इस समय पूरी तरह से नौकरशाही हावी हो चुकी है। सरकार वास्तविक जनहित के मुद्दों (जैसे बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था) से जनता का ध्यान भटकाने के लिए चुनिंदा अधिकारियों को निशाना बना रही है।

विपक्ष ने इस कार्रवाई की टाइमिंग पर भी सवाल खड़े करते हुए पूछा है कि जब ये अधिकारी सेवा में रहते हुए भ्रष्टाचार कर रहे होते हैं, तब शासन उन पर अंकुश क्यों नहीं लगाता? सेवानिवृत्ति के बाद की जाने वाली ऐसी कार्रवाइयां अक्सर राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से या केवल मीडिया की सुर्खियों में बने रहने के लिए की जाती हैं।

इस हाई-प्रोफाइल छापेमारी और उसके बाद शुरू हुई तीखी बयानबाजी ने उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार के सिंडिकेट और राजनीतिक नियंत्रण के अंतर्संबंधों को एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों द्वारा कोर्ट में पेश की जाने वाली चार्जशीट और रिपोर्ट इस मामले को एक नया कानूनी मोड़ देगी। तब तक, यह मुद्दा सरकार के लिए अपनी सख्त छवि को भुनाने और विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का एक बड़ा राजनीतिक हथियार बना रहेगा।