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तीन राज्यों में उपचुनाव का माहौल गरमाया

चुनाव आयोग की गतिविधियां भी सरगर्मी तेज करने वाली

  • दो राज्यों में सीधा मुकाबला

  • बिहार में जदयू वनाम राजद

  • नेताओं की साख दांव पर लगी

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारत निर्वाचन आयोग द्वारा बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात की कुछ रिक्त विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराने की प्रशासनिक तैयारियों और नामांकन प्रक्रिया के आधिकारिक दिशानिर्देश जारी करने के बाद, इन तीनों राज्यों में चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। हालांकि तकनीकी रूप से ये केवल कुछ सीटों पर होने वाले उपचुनाव हैं, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर इनका रणनीतिक महत्व किसी बड़े आम चुनाव से कम नहीं आंका जा रहा है।

इन उपचुनावों के बहाने देश के तीन प्रमुख राज्यों में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों की साख दांव पर लगी है। बिहार की राजनीति में यह उपचुनाव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जेडीयू और मुख्य विपक्षी दल राजद -कांग्रेस गठबंधन के लिए अपनी सांगठनिक पकड़ और जनाधार को साबित करने की अग्निपरीक्षा है। चूंकि बिहार में पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक निष्ठाएं और गठबंधन तेजी से बदलते रहे हैं, इसलिए विश्लेषक इस उपचुनाव को आगामी पूर्ण विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल मान रहे हैं।

मध्य प्रदेश और गुजरात में पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधा और द्विपक्षीय मुकाबला देखने को मिलेगा। सत्ताधारी भाजपा जहां अपने गढ़ को बचाने और अपनी संगठनात्मक ताकत का प्रदर्शन करने में जुटी है, वहीं कांग्रेस इन चुनावों के जरिए सत्ता विरोधी लहर को भुनाकर अपनी वापसी की राह तलाश रही है।

उपचुनावों को जीतने के लिए सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीतिक गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। सीटों के सीमित दायरे को देखते हुए दलों ने उम्मीदवारों के चयन में स्थानीय जातीय समीकरणों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है, ताकि सामाजिक संतुलन साधकर मतों का ध्रुवीकरण किया जा सके। बड़े राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय इस बार दल स्थानीय विकास, रोजगार, सड़क, पानी और कानून-व्यवस्था जैसे धरातलीय मुद्दों को चुनावी हथियार बना रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन उपचुनावों के परिणाम भले ही मौजूदा राज्य सरकारों के स्थायित्व को सीधे तौर पर प्रभावित न करें, लेकिन ये देश और राज्यों की मुख्यधारा की राजनीति के तात्कालिक मूड को जरूर स्पष्ट कर देंगे।

इन सीटों पर हार-जीत का अंतर बेहद कम होने की उम्मीद है। इसी वजह से इन छोटे समझे जाने वाले उपचुनावों में भी राष्ट्रीय स्तर के शीर्ष नेताओं ने स्टार प्रचारक के रूप में कमान संभाल ली है और जनसभाओं व रैलियों के जरिए अपनी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी कर ली है। आने वाले दिनों में यह चुनावी मुकाबला और भी दिलचस्प होने वाला है।