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सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के अनुरोध को नामंजूर कर दिया

लालू यादव की जमानत रद्द नहीं की जाएगी

  • झारखंड हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती

  • उच्च न्यायालय इस मामले को देखे

  • पहले के आदेश में हस्तक्षेप नहीं होगा

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चारा घोटाला मामलों में राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को दी गई जमानत को रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि छह साल बाद उनकी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा। हालांकि, शीर्ष अदालत ने झारखंड उच्च न्यायालय को निर्देश दिया कि वह उनकी सजा के निलंबन के खिलाफ लंबित आपराधिक अपीलों पर तेजी से फैसला करे और अधिमानतः छह महीने के भीतर इसका निपटारा करे।

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा दायर उन अपीलों पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत चारा घोटाला मामलों में सजा के बाद श्री यादव की सजा निलंबित कर दी गई थी और उन्हें जमानत दी गई थी।

पीठ ने कहा, हम आक्षेपित आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं क्योंकि इस आदेश को पारित हुए कई वर्ष बीत चुके हैं। उच्च न्यायालय से अपील में तेजी लाने और अधिमानतः छह महीने के भीतर फैसला करने का अनुरोध करना ही उचित होगा।

सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि उच्च न्यायालय ने श्री यादव को जमानत देते समय उनके द्वारा काटी गई कारावास की अवधि की गलत गणना की थी। श्री राजू ने दलील दी, न्यायाधीश द्वारा की गई गणना गलत है। उन्हें लगातार सजा काटनी थी, और इसलिए निचली अदालत का यह कहना गलत है कि उन्होंने आधी सजा काट ली है।

दूसरी ओर, श्री यादव की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 427, जो सजाओं के एक साथ या एक के बाद एक चलने को नियंत्रित करती है, केवल अंतिम फैसले के चरण में प्रासंगिक होती है, न कि सजा के निलंबन के आवेदन पर विचार करते समय। उन्होंने कहा कि अपीलों के निपटारे तक सजा को निलंबित करना उच्च न्यायालय के विवेक के दायरे में था।

पीठ इस तर्क से सहमत हुई और उसने कहा कि वह जमानत आदेश की समीक्षा करने के बजाय लंबित अपीलों पर त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के पक्ष में है। पीठ ने कहा, हमें सुनवाई में तेजी लानी होगी। हम आक्षेपित आदेश में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। श्री सिब्बल ने जवाब दिया कि वह अदालत द्वारा ऐसा आदेश पारित करने के रास्ते में नहीं आ सकते। इससे पहले फरवरी में भी शीर्ष अदालत ने संकेत दिया था कि वह श्री यादव की जमानत रद्द करने की इच्छुक नहीं है और इसके बजाय लंबित अपीलों की सुनवाई में तेजी लाएगी।