मौन के साये में प्रधानमंत्री की वैश्विक छवि
लोकतंत्र की बुनियाद जनता के प्रति जवाबदेही और पारदर्शी संवाद पर टिकी होती है। इस संवाद का सबसे सशक्त माध्यम स्वतंत्र पत्रकारिता है, जहाँ तीखे और कड़वे सवाल सत्ता की दिशा और दशा तय करते हैं। भारत के समकालीन राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में पारंपरिक और खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस की संस्कृति लगभग समाप्त हो गई है।
साल 2014 में सत्ता संभालने के बाद से अब तक प्रधानमंत्री ने देश के भीतर एक भी ऐसी खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित नहीं किया है, जहाँ पत्रकार बिना किसी पूर्व-निर्धारित पटकथा के सीधे और कड़वे सवाल पूछ सकें। इस रणनीतिक दूरी ने देश और दुनिया में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक समय था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को उनकी कम बोलने की आदत के कारण विपक्षी दलों, विशेषकर स्वयं नरेंद्र मोदी द्वारा मौन मोहन कहकर संबोधित किया जाता था।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक याद दिलाते हैं कि डॉ. मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल के दौरान नियमित रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे, विदेशों से लौटते वक्त विमान में पत्रकारों के तीखे सवालों के जवाब देते थे और राष्ट्रीय संकटों पर मीडिया के सामने आते थे। आज स्थिति पूरी तरह उलट चुकी है। कभी कड़े सवालों के साथ तत्कालीन सरकार को घेरने वाले नरेंद्र मोदी अब स्वयं कड़वे और अनपेक्षित सवालों पर मौन धारण कर लेते हैं। देश के भीतर संवाद का माध्यम अब केवल एकतरफा रह गया है, जिसमें मन की बात रेडियो कार्यक्रम, रैलियों में दिए जाने वाले भाषण और चुनिंदा गैर-राजनीतिक या पूर्व-निर्धारित साक्षात्कार शामिल हैं।
जब देश के भीतर अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक सौहार्द या सीमाओं की सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर जनता जवाब चाहती है, तब प्रधानमंत्री की ओर से सीधी प्रेस कॉन्फ्रेंस का न होना एक गंभीर शून्यता पैदा करता है। इस रुख से यह धारणा लगातार मजबूत हुई है कि प्रधानमंत्री असहज करने वाले और कड़वे सवालों का सामना करने से बचते हैं। देश के भीतर ऐसे कई संवेदनशील मुद्दे हैं, जिनपर खुली बहस या प्रेस कॉन्फ्रेंस होने की स्थिति में प्रधानमंत्री के लिए जवाब देना बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
देश में बढ़ती बेरोजगारी, मध्यम वर्ग पर करों का बोझ और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मंदी ऐसे विषय हैं जिनपर सरकार की नीतियां अक्सर आलोचना के घेरे में रहती हैं। विभिन्न राज्यों में समय-समय पर होने वाले आंतरिक तनाव, मणिपुर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की स्थिति और सीमाओं पर चीन के साथ जारी गतिरोध पर सरकार की ओर से आधिकारिक और खुली जवाबदेही का अभाव रहा है।
देश में सांप्रदायिक सौहार्द और मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर विपक्ष और स्वतंत्र नागरिक समाज लगातार सवाल उठाते रहे हैं। इन मुद्दों पर यदि खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रति-प्रश्न किए जाएं, तो सरकार के विमर्श को बनाए रखना कठिन हो जाता है। यही कारण माना जाता है कि घरेलू स्तर पर केवल एकतरफा संवाद को प्राथमिकता दी जाती है। घरेलू स्तर पर मीडिया को नियंत्रित करने या उससे दूरी बनाने की यह रणनीति विदेशों में काम नहीं आती। वैश्विक लोकतांत्रिक देशों में प्रेस की स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना जाता है, और वहां संयुक्त प्रेस वार्ताओं में पत्रकारों को सवाल पूछने का पूरा अधिकार होता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री की यह कमजोरी विदेशों में बार-बार उजागर हो जाती है।
तमाम राजनयिक पाबंदियों, प्रोटोकॉल और सावधानीपूर्वक तैयार किए गए दौरों के बावजूद, जब भी प्रधानमंत्री किसी पश्चिमी देश (जैसे अमेरिका या यूरोपीय देश) के दौरे पर जाते हैं, तो वहां के पत्रकार बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर सीधे सवाल दाग देते हैं। ऐसी परिस्थितियों में जब प्रधानमंत्री या तो उन सवालों के सीधे और तार्किक जवाब देने से बचते हैं, या फिर स्थापित लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप प्रति-प्रश्नों का सामना नहीं कर पाते, तो इसका सीधा असर भारत की वैश्विक छवि पर पड़ता है।
एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति और मदर ऑफ डेमोक्रेसी (लोकतंत्र की जननी) का दावा करने वाले देश के राष्ट्रप्रमुख का कड़वे सवालों पर असहज होना वैश्विक मंचों पर भारत की साख को कमजोर करता है। लोकतंत्र में सवाल पूछना किसी भी नागरिक या पत्रकार का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि उसका मौलिक कर्तव्य है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता निसंदेह बहुत अधिक है, लेकिन खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस से उनकी यह कगातार दूरी उनकी छवि पर एक गंभीर दाग की तरह काम करती है। संवाद की इस कमी से यह संदेश जाता है कि सरकार केवल अपनी सफलताओं का प्रचार करना चाहती है, अपनी कमियों पर उठने वाली आवाज़ों का सामना करने का साहस उसमें नहीं है।