अपने ही नागरिकों को अविश्वास करता देश
ऐसा क्या है जो यह साबित करता है कि मैं अपने ही देश का हूँ? यदि यह केवल एक वैचारिक या दार्शनिक प्रश्न होता जिसे बुद्धिजीवी और दार्शनिक अपने बंद कमरों में एक-दूसरे से पूछते, तो बात अलग होती। लेकिन आज यह सवाल भारतीय नागरिकों को अक्सर और गहरे तरीके से झकझोरने लगा है। नागरिकता का यह संकट अब केवल कानूनी बहस का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि यह आम आदमी की पहचान और अस्तित्व से जुड़ चुका है। यह प्रशासनिक स्पष्टीकरण सामने आया कि पासपोर्ट नागरिकता का पुख्ता प्रमाण नहीं है, तो ऐसा लगा कि पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई है।
पिछले कुछ वर्षों में अन्य सरकारी दस्तावेजों के बारे में भी इसी तरह की बातें कही गई हैं। हमें बताया जाता है कि आधार केवल पहचान का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। मतदाता पहचान पत्र नागरिकता का अंतिम और निर्णायक सबूत नहीं है, और राशन कार्ड केवल कल्याणकारी योजनाओं की पात्रता साबित करने से ज्यादा कुछ नहीं करता। जन्म प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र और अन्य आधिकारिक दस्तावेजों की अपनी-अपनी सीमाएं तय कर दी गई हैं। अलग-अलग देखा जाए तो इन सभी प्रशासनिक बयानों के पीछे कोई न कोई कानूनी या तकनीकी स्पष्टीकरण हो सकता है।
लेकिन जब हम इन्हें समग्र रूप से देखते हैं, तो एक बेहद परेशान करने वाली तस्वीर उभरती है। यह स्थिति एक सामान्य नागरिक को यह मौलिक संवैधानिक प्रश्न पूछने पर मजबूर करती है कि आखिर यह गणतंत्र नागरिकता के प्रमाण के रूप में किस दस्तावेज पर अंतिम भरोसा करता है? या शायद इससे भी ज्यादा असहज करने वाला सवाल यह है कि क्या हमारा गणतंत्र अपने नागरिकों पर भरोसा करता भी है या नहीं? अपने जन्मकाल से ही भारतीय लोकतंत्र एक सरल नैतिक धारणा पर टिका हुआ था। वह धारणा यह थी कि जब तक इसके विपरीत कोई ठोस सबूत न हो, तब तक हर व्यक्ति इस देश का नागरिक है और वह यहीं का है।
संदेह का बोझ हमेशा राज्य पर होना चाहिए, न कि नागरिक पर। किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र की नींव नागरिकों के प्रति विश्वास पर रखी जाती है, न कि निरंतर संदेह की भावना पर। और निश्चित रूप से, संदेह की यह स्थिति कभी भी स्थायी या अनंत नहीं हो सकती। दुर्भाग्य से, राज्य और नागरिक के बीच का यह पारस्परिक विश्वास, जिसे हम सामाजिक अनुबंध कहते हैं, हाल के दिनों में पूरी तरह से पलट गया है।
आज का भारतीय नागरिक फाइलों, प्रमाणपत्रों, फोटोकॉपी, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और दस्तावेजी सत्यापन की एक अंतहीन यात्रा करने के लिए अभिशप्त दिखाई देता है। हर कुछ वर्षों में एक नई प्रशासनिक प्रक्रिया सामने आती है, जो यह मांग करती है कि नागरिक उस पहचान का नया सबूत दें जिसे बहुत पहले ही स्थापित और स्वीकृत किया जा चुका था। हर दस्तावेज अनंतिम बन जाता है और हर पहचान अस्थायी लगने लगती है। यह एक बेहद खतरनाक स्थिति है, जहां प्रत्येक प्रमाणपत्र के भीतर भविष्य में अमान्य हो जाने की आशंका छिपी होती है। वह गणतंत्र जो कभी अपने नागरिकों को सहर्ष पहचानता था, वह अब धीरे-धीरे एक ऐसे गणतंत्र में तब्दील हो रहा है जो बार-बार उनसे पूछताछ करता है। हालांकि प्रशासनिक कमियों और बाधाओं पर चर्चा होती रही है, लेकिन भारतीय राष्ट्र और राज्य के दार्शनिक चरित्र में आ रहे इस गहरे बदलाव पर जितना सार्वजनिक ध्यान दिया जाना चाहिए था, उतना नहीं दिया गया।
हमारे संविधान ने नागरिकता की कल्पना कभी भी किसी आधिकारिक विवेक या दया पर निर्भर रहने वाले उपहार के रूप में नहीं की थी। नागरिकता को उस आधारशिला के रूप में देखा गया था जिससे हर लोकतांत्रिक अधिकार का जन्म होता है। मतदान का अधिकार, कानून के समक्ष समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सार्वजनिक संस्थानों तक पहुंच—इन सबकी वैधता इसी स्थापित संवैधानिक पहचान से आती है। डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने बार-बार याद दिलाया था कि संवैधानिक नैतिकता केवल संस्थाओं के निर्माण या अस्तित्व से नहीं, बल्कि उन परंपराओं, संयम और लोकतांत्रिक प्रथाओं से जीवित रहती है जो संस्थाओं को कार्यशील बनाती हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया था कि यह नैतिकता स्वाभाविक नहीं होती, बल्कि इसे सीखा जाता है। शासन की आदतों में राज्य का यह कर्तव्य शामिल है कि वह अपने लोगों में भय और चिंता पैदा करने के बजाय विश्वास जगाए। एक चिंतित और डरा हुआ नागरिक कभी भी एक आत्मविश्वासी लोकतंत्र का निर्माण नहीं कर सकता। दुर्भाग्य यह है कि जिस काम की जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की थी, वह पूरी की पूरी अब जनता के कंधे पर डाल दी गयी है। स्पष्ट तौर पर कोई मानदंड स्थापित नहीं है कि आखिर किस दस्तावेज को नागरिकता का प्रमाण माना जाए। जो दलीले दी जा रही हैं वे व्यवहारिक नहीं है।