Breaking News in Hindi

बंगाल, जनता का आक्रोश और दलबदलुओं की बेचैनी

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से तीव्र संघर्षों, वैचारिक टकरावों और जन-आंदोलनों की भूमि रही है। परंतु, हालिया दिनों में राज्य के भीतर जो राजनीतिक दृश्य उभरकर सामने आ रहे हैं, वे न केवल चिंताजनक हैं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के बदलते स्वरूप पर भी कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। एक जघन्य अपराध के बाद उपजी परिस्थितियों ने राज्य के भीतर एक नया राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है।

पीड़ित परिवार से मिलने और घटनास्थल का दौरा करने से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को रोकने की कोशिशों से लेकर, अदालत के आदेश पर कोलकाता की सड़कों पर निकले शांतिपूर्ण विरोध मार्च पर हुए हमलों तक, हर घटना एक बड़े राजनीतिक खेल और गहरे असंतोष की ओर इशारा करती है। किसी भी जघन्य अपराध के बाद पीड़ित परिवार के साथ खड़े होना और न्याय की मांग करना विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों का लोकतांत्रिक अधिकार है।

परंतु जब एक राज्य के शीर्ष नेतृत्व को ही घटनास्थल पर जाने से रोकने की रणनीति बनाई जाने लगे, तो यह साफ हो जाता है कि राजनीति अब केवल विचारधारा की जंग नहीं रह गई है, बल्कि यह व्यक्तिगत और प्रतिशोधात्मक रूप ले चुकी है। कोलकाता में जब अदालत की अनुमति के बाद एक शांतिपूर्ण मार्च निकाला गया, तो उस पर हुआ हमला यह दिखाता है कि कुछ राजनीतिक दल कानून और न्यायपालिका के आदेशों को भी ठेंगा दिखाने पर आमादा हैं।

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व वाली डबल इंजन सरकार की वह छटपटाहट दिखाई देती है, जो बंगाल की धरती पर अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए हर संभव हथकंडा अपना रही है। लेकिन राजनीति का एक बुनियादी नियम है—नेताओं को डरा-धमकाकर या प्रलोभन देकर पाला बदलवाया जा सकता है, जनता की निष्ठा और उनके दिलों को नहीं बदला जा सकता।

पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल ने भारी मात्रा में दलबदल की राजनीति देखी है। तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े चेहरे और नेता अपनी मूल पार्टी छोड़कर भाजपा के पाले में चले गए। इस दलबदल को एक समय पर बड़ी राजनीतिक सफलता के रूप में पेश किया गया था, लेकिन आज की वास्तविकता कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

भाजपा की शह पर पाला बदलने वाले इन नेताओं को आज अपने ही क्षेत्रों में भारी जन-विरोध और अपमान का सामना करना पड़ रहा है। वे नेता जो कभी अपने क्षेत्रों में अजेय माने जाते थे, आज जब जनता के बीच जा रहे हैं, तो उनके स्वागत में तालियां नहीं बल्कि गद्दार, बेईमान और चोर के नारे गूंज रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि आम जनता अब अवसरवादी राजनीति को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। विचारधारा छोड़कर सत्ता की मलाई चाटने वाले नेताओं को जनता ने सिरे से खारिज करना शुरू कर दिया है।

जिन चेहरों के दम पर भाजपा बंगाल फतह करने का सपना देख रही थी, उनकी खुद की साख दांव पर लग चुकी है। यह आक्रोश किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे बंगाल की उस सामूहिक चेतना का हिस्सा बनता जा रहा है, जो धोखे और विश्वासघात को बर्दाश्त नहीं करती।

केंद्र और कुछ राज्यों में सत्तासीन भाजपा की डबल इंजन सरकार ने बंगाल की जनता के मन से ममता बनर्जी की छवि को धुंधला करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। सच्चाई को कितनी भी शिद्दत से दबाने की कोशिश की जाए, वह किसी न किसी रूप में, जन-आक्रोश के माध्यम से बाहर आ ही जाती है। आज जो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिनमें शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमले हो रहे हैं और दलबदलू नेताओं को जनता खदेड़ रही है, वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि बंगाल की जनता का मिजाज क्या है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे दुखद भूमिका कानून व्यवस्था की है। सोशल मीडिया पर हमलों के पुख्ता वीडियो साक्ष्य मौजूद होने के बाद भी पुलिस द्वारा कोई ठोस कार्रवाई न करना प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक विद्वेष की पराकाष्ठा है। जब कानून निष्पक्ष रहने के बजाय किसी एक राजनीतिक एजेंडे का टूल बन जाता है, तो जनता का व्यवस्था पर से विश्वास उठने लगता है। पश्चिम बंगाल आज एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है।

दलबदलुओं के प्रति जनता का गुस्सा और शांतिपूर्ण आवाजों को दबाने की सत्ताधारी कोशिशें एक खतरनाक माहौल तैयार कर रही हैं। एकतरफा कार्रवाई जारी रही, तो जनता के धैर्य का बांध टूट जाएगा। जब आम जनता अपनी सहने की सीमा समाप्त होने के बाद अधिक उग्र होकर सड़कों पर उतरेगी, तब स्थिति को संभालना किसी भी सरकार या व्यवस्था के बस में नहीं होगा। इतिहास गवाह है कि बंगाल जब करवट लेता है, तो बड़े-बड़े सियासी साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।