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ओ चोरी हो गई , हवा में चोरी का गंध ज्यादा फैला है.. .. ..

आजकल देश में हवाओं का रुख बदला हुआ है। हवा में ऑक्सीजन कम और चोरी की गंध ज्यादा है। यह गंध कहीं राम मंदिर के चंदे से आ रही है, तो कहीं राज्यसभा के मतपेटियों से। ऐसा लगता है जैसे चोरी अब केवल भारतीय दंड संहिता की धारा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक नई शैली बन गई है।

हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी का हाल ही में स्विट्जरलैंड का दौरा हुआ। सुना है, वहाँ पहाड़ों की ठंडी हवाओं में उन्हें एक चूभता हुआ सवाल मिला थे, जिनसे वे इतनी तेज़ी से भागे कि स्विस घड़ी बनाने वाले भी दंग रह गए। इधर देश के भीतर का मंज़र और भी दिलचस्प है। राज्यसभा चुनावों में वोट चोरी का शोर ऐसा है जैसे किसी ने राशन की दुकान पर लाइन तोड़ दी हो।

लोग पूछते हैं, वोट कहाँ गया? तो जवाब मिलता है, वह तो डिजिटल हो गया है। अब जब वोट डिजिटल हो गया, तो वह क्लाउड में कब उड़ गया, किसे पता? बंगाल में चुनाव याचिकाएं दायर हो रही हैं। अचानक से गायब हो जाने वाली कला  है, जिसे जादूगर पी.सी. सरकार भी नहीं समझा सकते। अब तो महाराष्ट्र के छह सांसदों की भी चोरी हो गयी है। कहां है कोई नहीं जानता।

सबसे ऊपर, सोने में सुहागा है राम मंदिर के चंदे की चोरी का मुद्दा। भक्तों में हड़कंप है—वे यह तय नहीं कर पा रहे कि वे श्रद्धा के आंसू बहाएं या अपनी जेब की सुरक्षा करें। धर्म और धन का यह ऐसा संगम है, जिसे देखकर साक्षात यमराज भी अपने बही-खाते दोबारा जांचने लगे होंगे।

देखा जाए तो यह सब एक परफेक्ट सिस्टम की तरह काम कर रहा है। स्विट्जरलैंड से सवाल चुरा लिए गए, राज्यसभा से वोट चुरा लिए गए, और मंदिर से चंदा! सरकार कह रही है कि देश तरक्की कर रहा है। और वाकई, तरक्की तो है—पहले लोग एक-एक पैसा गिनकर चोरी करते थे, अब तो सीधे इकोसिस्टम को ही निशाना बनाया जा रहा है। यह चोर-पुलिस का खेल अब इतना पारदर्शी हो गया है कि चोर को पकड़ने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि चोर खुद ही कैमरे के सामने आकर सेल्फी खींच रहा होता है।

इसी बात पर फिल्म सरफरोश का यह गीत याद आ रहाहै। इस गीत को लिखा था अनजान ने और संगीत में ढाला था किशोर कुमार ने। इसे आशा भोंसले और किशोर कुमार ने अपना स्वर प्रदान किया था। गीत के बोल इस तरह हैं

चोरी हो गई, हो गई, हो गई

ओ चोरी हो गई, दिल ले गया तू

चोरी हो गई, दिल ले गया तू

मेरे सीने की धड़कन ले गया तू

ओ चोरी हो गई, दिल ले गया तू

मस्ती छा गई, छा गई, छा गई

ओ मस्ती छा गई, दिल ले गया तू

मेरे सीने की धड़कन ले गया तू

मस्ती छा गई, दिल ले गया तू

हुस्न की मैं हूँ एक परी, मेरा ये रूप है जादू

बातें तेरी बड़ी खरी, पर मैं भी हूँ बेकाबू

तुझको देख के रुक गई, मेरी ये चाल मस्तानी

मुझको देख के झुक गई, तेरी ये आँख दीवानी

ओ हो… चोरी हो गई, दिल ले गया तू

मस्ती छा गई, दिल ले गया तू

पापा मेरे बड़े सख्त हैं, उनको ज़रा ना भाओगे

मुझमें कोई नहीं है वक्त, तुम भी तो पछताओगे

दिल में आग लगा के तू, कहाँ चला है अंजाना

तुझे तो मैं ले जाऊँगा, पकड़ के दामन दीवाना

ओ हो… चोरी हो गई, दिल ले गया तू

मस्ती छा गई, दिल ले गया तू

मेरे सीने की धड़कन ले गया तू

ओ चोरी हो गई, दिल ले गया तू

अंत में, जनता तो बस मूकदर्शक है। वह राम-राम जपती है, वोट देती है, और उम्मीद करती है कि अगली सुबह जब वह उठेगी, तो उसका घर, उसकी नौकरी और उसका भरोसा अपनी जगह सलामत होगा। पर डर इस बात का है कि कहीं कल सुबह उठकर उसे यह न पता चले कि लोकतंत्र भी किसी ने चोरी कर लिया है और अब वह नीलामी के लिए किसी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में रखा गया है। पर फिक्र मत कीजिए, हमारे नेता तो हैं ही—वे तुरंत एक नई कमेटी बना देंगे और उस कमेटी का नाम होगा— चोरी रोकने के लिए चोरी करने वाली जांच समिति।

यही है आज का नया भारत! जहाँ चंदा चोरी पर भी डिबेट होती है, पर चोरी करने वाले की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। आखिर चोरी करना भी तो एक कौशल है, और इस कौशल में हमारे नेताओं से बेहतर भला कौन हो सकता है? बस दुआ कीजिए कि अगली बार जब आप अपने बिस्तर पर सोएं, तो यह पक्का कर लें कि आपने अपनी नींद और अपने सपने भी लॉक कर दिए हैं, क्योंकि आजकल चोरी की कोई सीमा नहीं है।