मिट्टी से चलने वाला फ्यूल सेल विकसित
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अब बिना बैटरी के भी चलेंगे सेंसर
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मिट्टी के सूक्ष्मजीव क्यों हैं महत्वपूर्ण?
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यह फ्यूल सेल अनंत काल तक चलेगा
राष्ट्रीय खबर
रांचीः नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक क्रांतिकारी माइक्रोबियल फ्यूल सेल (एमएफसी) विकसित किया है, जो मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके बिजली पैदा करता है। एक छोटी किताब के आकार का यह उपकरण मिट्टी में मौजूद कार्बनिक पदार्थों के अपघटन से निकलने वाली ऊर्जा को संचित करता है। यह तकनीक भविष्य में उन बैटरियों का विकल्प बन सकती है जो पर्यावरण के लिए हानिकारक, ज्वलनशील और महंगी होती हैं।
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इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य सटीक कृषि और पर्यावरणीय निगरानी में उपयोग होने वाले भूमिगत सेंसरों को ऊर्जा देना है। शोधकर्ताओं ने इस फ्यूल सेल के माध्यम से मिट्टी की नमी मापने वाले और स्पर्श पहचानने वाले सेंसरों को सफलतापूर्वक चलाकर दिखाया। यह उपकरण न केवल टिकाऊ है, बल्कि बाढ़ और सूखे जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी विश्वसनीय पाया गया है। अन्य समान प्रणालियों की तुलना में यह 120 फीसद अधिक समय तक ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम है।
इंटरनेट ऑफ थिंग्स के बढ़ते दौर में अरबों उपकरणों को चलाने के लिए भारी धातुओं और लिथियम पर निर्भर रहना पर्यावरणीय संकट पैदा कर सकता है। नॉर्थवेस्टर्न के पूर्व छात्र बिल येन के अनुसार, जब तक मिट्टी में कार्बनिक कार्बन मौजूद है, यह फ्यूल सेल अनंत काल तक बिजली पैदा कर सकता है। यह फ्यूल सेल एक बैटरी की तरह काम करता है, लेकिन रासायनिक प्रतिक्रिया के बजाय इसमें बैक्टीरिया इलेक्ट्रॉनों को मुक्त करते हैं, जिससे विद्युत प्रवाह उत्पन्न होता है।
मिट्टी आधारित फ्यूल सेल का विचार 1911 से अस्तित्व में है, लेकिन कम नमी में इनका प्रदर्शन खराब रहता था। इस नई डिजाइन में जियोमेट्री (बनावट) को बदलकर इस समस्या को सुलझाया गया है। इसमें एनोड और कैथोड को एक-दूसरे के समानांतर रखने के बजाय लंबवत रखा गया है। इसका ऊपरी हिस्सा हवा (ऑक्सीजन) के संपर्क में रहता है, जबकि निचला हिस्सा नमी सोखने के लिए मिट्टी में गहराई तक दबा रहता है।
यह तकनीक पूरे शहरों को रोशन करने के लिए नहीं, बल्कि कम बिजली खपत वाले सेंसरों के लिए एक उत्कृष्ट समाधान है। शोधकर्ता अब इसे पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल (जैव-अपघटनीय) बनाने पर काम कर रहे हैं, ताकि भविष्य में ये उपकरण बिना किसी कचरे के प्रकृति में विलीन हो सकें। यह नवाचार कृषि और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
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