हुजूर आते आते बहुत देर कर दी
भारत के सत्ताधारी शासन के दो दिग्गज नेताओं और छात्रों के बीच हाल ही में हुए दो संवाद बेहद ज्ञानवर्धक और आंखें खोल देने वाले रहे हैं। पहले मामले में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई में एक सम्मेलन के दौरान छात्रों के साथ बातचीत करते हुए यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि विरोध प्रदर्शन—संभवतः कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व वाले उस विरोध प्रदर्शन सहित, जिसके कारण धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा—संवाद का एक वैध रूप है।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि वास्तविक असंतोष से प्रेरित होकर सड़कों पर उतरे पीड़ित युवा राष्ट्र-विरोधी नहीं हैं, जो कि अक्सर असहमति जताने वालों को बदनाम करने के लिए भगवा इकोसिस्टम द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक अपमानजनक विशेषण रहा है। संघ परिवार के अधिकारियों (जिनमें आरएसएस के सह-सरकार्यवाह भी शामिल हैं) द्वारा प्रदर्शनकारियों को लगातार कलंकित करने के प्रयासों के मद्देनजर श्री भागवत की ये टिप्पणियां अत्यधिक महत्व रखती हैं।
इसके अलावा, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली के दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अन्य बात रखी जिसका संबंध इस बात से है कि नया भारत किस प्रकार शासित होता है। श्री मोदी ने छात्रों से हर बात पर सवाल उठाने का आग्रह किया, जो कि देश के युवाओं ने अपने आंदोलन के दौरान किया था, और जिसके एवज में उन्हें केवल निंदा और पुलिस की ज्यादतियों का सामना करना पड़ा था।
श्री भागवत और श्री मोदी के ये विचार स्वागत योग्य हैं। हालांकि, इन टिप्पणियों का समय और इनका लहजा बहुत कुछ कहता है। जिस तरीके से केंद्र सरकार ने सीजेपी के विरोध प्रदर्शन को संभाला—या यों कहें कि जिस तरह से उसका कुप्रबंधन किया—उसने पूरे भारत के युवाओं के गुस्से और उनकी निराशा को और बढ़ा दिया है। अब सत्ता में बैठे लोगों को इस बात की चिंता सताने लगी है कि यह बना हुआ असंतोष आने वाले समय में चुनावी प्रतिक्रिया या बैकलैश का रूप ले सकता है।
दरअसल हर चुनावी पैंतरे को समय से पूर्व भांप लेने की कला में महारत रखने वाले मोदी ने पहली बार चूक कर दी और यह एक ऐसी बड़ी चूक है, जिसकी वजह से पूरी भाजपा को अब परेशान होना पड़ रहा है। पार्टी ने मौका देखकर फिर से युवाओँ के साथ खुद को जोड़ने का प्रयास तो किया है पर उसमें भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही क्योंकि पूर्व में जंतर मंतर के मामले में भाजपा नेताओँ के बयान बहुत अधिक गंभीर घाव कर चुके हैं।
श्री भागवत के इस महत्वपूर्ण हस्तक्षेप को भारत के युवाओं द्वारा एक ऐसी प्रतिक्रिया के रूप में समझा जा सकता है जो बहुत देर से आई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी इस आलोचना के लिए भी आलोचना की जाती रही है कि उन्होंने विरोध प्रदर्शनों से निपटने के लिए सरकार द्वारा अपनाए गए शुरुआती मनमाने और कठोर रुख पर लगाम लगाने के लिए बहुत कम प्रयास किए थे।
प्रधानमंत्री मोदी के सवाल पूछने वाले प्रोत्साहन के बावजूद, यदि कोई युवा यह सवाल करे कि क्या उनकी सरकार ने वास्तव में कभी भी किसी भी तरह की जांच-पर्क या आलोचना को प्रोत्साहित किया है—चाहे वह संसद की ओर से हो, प्रेस की ओर से हो या फिर आम जनता की ओर से—तो उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता। यदि केंद्र सरकार ने लगातार संवाद के प्रति खुलापन दिखाया होता, तो छात्रों या किसानों द्वारा किए जाने वाले विरोध प्रदर्शनों को न तो लाठियों का सामना करना पड़ता और न ही सुनियोजित तरीके से अपमानित होना पड़ता।
भारत का पूरा राजनीतिक वर्ग—चाहे वे सत्ता में हों या विपक्ष में—अचानक से युवाओं के महत्व को लेकर जाग उठा है। स्वाभाविक रूप से उनके इरादे और प्रोत्साहन चुनावी नफा-नुकसान से जुड़े हैं। आज देश के युवाओं को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उनसे निपटने के लिए उन्हें केवल मौखिक आश्वासनों की नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत हस्तक्षेपों की आवश्यकता है।
अब केवल दिलासा देने और सतही उपदेश देने का समय पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। लिहाजा अब नरेंद्र मोदी खुद पहली बार ऐसी चुनौती का सामना कर रहे हैं, जिसका अनुभव उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी नहीं हुआ था। अपने लंबे राजनीतिक जीवन के दौरान वह ऐसी चुनौती के सामने कभी नहीं आये थे। अपनी पुरानी शैली में आंदोलनों को कुचलने का प्रयास उन्होंने किसान आंदोलन के दौरान भी किया था। नतीजा क्या हुआ था सभी के सामने है। लिहाजा यह माना जा सकता है कि नरेंद्र मोदी ने पूर्व के अनुभवों से सबक लेने की आदत को छोड़ दिया था, जिसका यह नतीजा सामने है।