मोदी सरकार के समक्ष गठबंधन धर्म की नई चुनौती
भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। पिछले कुछ दिनों में जो राजनीतिक घटनाक्रम सामने आए हैं, विशेष रूप से तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों का एनसीपीआई में विलय और उसके बाद एनडीए के भीतर बढ़ती गतिविधियों ने सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
ऊपर से शिवसेना (यूबीटी) के भी कुछ सांसदों के पाला बदल की ताजी सूचना है। यह केवल एक दल के टूटने या जुड़ने का मामला नहीं है, बल्कि यह उन नए राजनीतिक समीकरणों की दस्तक है, जिन्हें साधना मोदी सरकार के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। राजनीति के जानकारों का मानना है कि टीएमसी से एनसीपीआई में शामिल होने वाले सांसदों को अब केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान देने की मांग उठना स्वाभाविक है।
गठबंधन की राजनीति में यह एक अलिखित नियम बन गया है कि जो दल साथ आते हैं, वे अपनी राजनीतिक भागीदारी और हिस्सेदारी भी सुनिश्चित करना चाहते हैं। लेकिन यहाँ शून्य-योग खेल वाली स्थिति उत्पन्न हो रही है। यदि एनसीपीआई को मंत्रिमंडल में जगह दी जाती है, तो स्वाभाविक रूप से अन्य दलों का कोटा प्रभावित होगा। सबसे बड़ी चुनौती जदयू और टीडीपी जैसे पुराने और विश्वसनीय सहयोगियों को संतुष्ट रखने की है। ये दोनों दल एनडीए की नींव हैं और सरकार के स्थायित्व के लिए अनिवार्य हैं।
यदि मंत्रिमंडल पुनर्गठन में इनकी हिस्सेदारी या प्रमुख विभागों में कटौती की गई, तो यह एक नए राजनीतिक बवाल को जन्म दे सकता है। गठबंधन की राजनीति में असंतोष की एक छोटी सी चिंगारी भी बड़े संकट में बदल सकती है, और मोदी सरकार इस जोखिम को मोल लेने की स्थिति में नहीं है। भाजपा में इन दिनों संगठन से लेकर केंद्रीय मंत्रिमंडल तक में फेरबदल की चर्चाएं जोरों पर हैं।
दो मंत्रियों को दोबारा राज्यसभा का टिकट न मिलना इस बात का संकेत है कि पार्टी आलाकमान अब प्रदर्शन आधारित राजनीति की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, यह निर्णय जितना साहसी है, उतना ही संवेदनशील भी। आगे होने वाला पुनर्गठन केवल प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन बनाने के लिए भी जरूरी है।
आने वाले समय में भाजपा को एक तरफ नए सहयोगियों को गले लगाना है, तो दूसरी तरफ अपने उन पुराने वफादारों को भी दरकिनार करने से बचना है जिन्होंने कठिन समय में पार्टी का साथ दिया। यह संतुलन बनाना तलवार की धार पर चलने जैसा है। हर दल का अपना एक जनाधार और अपनी आकांक्षाएं हैं। जो दल आज साथ हैं, वे किसी न किसी राजनीतिक लाभ या भविष्य की संभावनाओं के लालच में हैं। यदि किसी के हिस्से में अपेक्षा से कम आता है, तो नाराजगी का शोर सत्ता के गलियारों में सुनाई देने लगेगा।
विपक्षी खेमे में मची टूट-फूट और सत्ता में शामिल होने की होड़ ने स्थिति को और पेचीदा बना दिया है। एनसीपीआई का मामला दिखाता है कि कैसे विचारधारा से परे जाकर राजनीतिक सुविधा के आधार पर गठबंधन बन रहे हैं। सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह इस दलबदल को स्वीकार्यता तो दे रही है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे?
क्या यह एक मजबूत एनडीए का निर्माण करेगा या भविष्य में खींचतान का केंद्र बनेगा? प्रधानमंत्री मोदी, जो अपनी रणनीतिक सूझबूझ के लिए जाने जाते हैं, उन्हें अब एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा। एक तरफ उन्हें सरकार की नीतियों को गति देनी है, दूसरी तरफ मंत्रिमंडल में योग्यता और राजनीतिक मजबूरी के बीच तालमेल बिठाना है।
उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी सहयोगी दल को यह महसूस न हो कि उनकी उपेक्षा की जा रही है। आगामी समय में होने वाला मंत्रिमंडल पुनर्गठन न केवल मोदी सरकार की कार्यशैली को तय करेगा, बल्कि यह भी दिखाएगा कि एनडीए का गठबंधन धर्म कितना मजबूत है।
राजनीति का यह नया समीकरण एक तरफ नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, तो दूसरी तरफ यह असंतोष की नई परतों को भी जन्म दे सकता है। मोदी सरकार के लिए अब यह अनिवार्य हो गया है कि वह अपने सहयोगियों के साथ संवाद को और अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाए। राजनीति में सबको साथ लेकर चलना केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक कठिन साधना है। आज सरकार उसी साधना के सबसे जटिल चरण से गुजर रही है। देखना यह है कि प्रधानमंत्री की टीम इन समीकरणों को कितनी कुशलता से साधेगी और क्या वे सरकार के स्थायित्व को बरकरार रखते हुए सबको संतुष्ट कर पाएंगे। यह दौर न केवल मोदी सरकार की परीक्षा ले रहा है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की गठबंधन संस्कृति की परिपक्वता की भी परीक्षा है। इसमें जरा सी चूक भी बड़ा खतरा बन सकती है।