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संस्थाओं की साख और उभरते यक्ष प्रश्न

मध्यप्रदेश में राज्यसभा नामांकन के दौरान उपजा हालिया विवाद केवल एक सीट के राजनीतिक समीकरणों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतांत्रिक ढांचे की रीढ़ मानी जाने वाली संस्थाओं की निष्पक्षता पर एक गंभीर विमर्श खड़ा करता है।

कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को रिटर्निंग अफसर द्वारा इस आधार पर खारिज कर देना कि उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एक मामले की जानकारी छिपाई, और उस पर कांग्रेस का यह तर्क कि मामला अभी तक अदालत द्वारा संज्ञान में ही नहीं लिया गया है

—इन दोनों पक्षों के बीच की कानूनी महीन रेखा ने देश के राजनीतिक और विधिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस पूरे घटनाक्रम का सीधा और तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि भारतीय जनता पार्टी के एक और प्रत्याशी के लिए उच्च सदन की राह आसान हो गई।

राजनीति में एक-एक सीट का महत्व सर्वविदित है, विशेषकर राज्यसभा जैसे सदन में जहां विधायी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए संख्या बल बेहद निर्णायक होता है। परंतु, इस रणनीतिक लाभ-हानि से परे, असली चिंता उन संस्थागत प्रक्रियाओं को लेकर है जो इस निर्णय का आधार बनीं। कांग्रेस का तर्क है कि जिस मामले को आधार बनाकर नामांकन रद्द किया गया, उसमें केवल नोटिस जारी हुआ है, न कि कोई आरोप तय हुए हैं या अदालत ने संज्ञान लिया है।

चुनावी कानूनों के तहत किसी उम्मीदवार को अयोग्य ठहराने या उसका नामांकन रद्द करने के नियम बेहद स्पष्ट और कड़े हैं। ऐसे में यदि बिना पूर्ण विधिक संज्ञान के किसी प्रत्याशी की उम्मीदवारी निरस्त की जाती है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या रिटर्निंग अफसर का फैसला कानून की भावना के अनुरूप था या इसके पीछे कोई प्रशासनिक अति-सक्रियता काम कर रही थी? इस विवाद में सबसे चिंताजनक पहलू चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर सामने आया है।

विपक्ष का आरोप है कि आयोग को इस संबंध में ज्ञापन सौंपे जाने के बाद भी उसकी ओर से कोई त्वरित या प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। चुनाव आयोग को भारतीय संविधान ने एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और स्वायत्त निकाय के रूप में स्थापित किया है, जिसका मुख्य कार्य हर दल के लिए एक समान अवसर सुनिश्चित करना है।

जब मुख्यधारा के विपक्षी दल यह आरोप लगाने लगें कि आयोग का रवैया पक्षपातपूर्ण है, तो यह केवल एक शिकायत नहीं रह जाती, बल्कि यह उस भरोसे पर चोट होती है जो इस देश के नागरिकों का अपनी चुनावी प्रणाली पर है। आयोग की कथित चुप्पी या सुस्ती उसकी साख को कटघरे में खड़ा करती है। प्रशासनिक और चुनावी मोर्चे से निराश होने के बाद अमूमन राजनीतिक दल न्यायपालिका का रुख करते हैं।

इस मामले में भी कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट की अवकाश पीठ (वेकेशन बेंच) के समक्ष इस मुद्दे को ले जाने का मन बनाया है। लेकिन यहां भी देश के बुद्धिजीवियों और सजग नागरिकों के मन में कुछ असहज करने वाले प्रश्न तैर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल के दिनों में चुनाव से जुड़े कुछ बड़े मुद्दों, जैसे वोट चोरी के आरोपों और एसआईआर जैसे मामलों पर तात्कालिक या कड़ा रुख न अपनाना, जनता के एक वर्ग में संशय पैदा कर रहा है।

इस संशय को बल तब और मिलता है जब ऐसे महत्वपूर्ण समय पर यह जानकारी सामने आती है कि देश की शीर्ष अदालत के कई माननीय न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिवक्ता एक सरकारी प्रायोजित बैडमिंटन मैच खेलने के लिए विदेश दौरे पर हैं। हालांकि, जजों के व्यक्तिगत जीवन, उनके अवकाश के समय या खेल गतिविधियों में शामिल होने पर कोई कानूनी रोक नहीं है और इसे उनके पेशेवर दायित्वों से सीधे जोड़कर देखना पूरी तरह उचित नहीं हो सकता, लेकिन लोकतंत्र में ‘परसेप्शन’ यानी धारणा का बहुत महत्व होता है।

जब देश में चुनावी निष्पक्षता और संस्थागत संकट जैसे गंभीर मुद्दों पर तुरंत सुनवाई की दरकार हो, तब न्यायपालिका के शीर्ष चेहरों की ऐसी व्यस्तताएं आम जनता के मानस में यह सवाल पैदा कर देती हैं कि क्या अदालतें इन संवेदनशील मामलों को उतनी प्राथमिकता दे रही हैं जितनी दी जानी चाहिए। न्यायपालिका को न केवल निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि उसका निष्पक्ष दिखना भी उतना ही अनिवार्य है। इस विकट परिस्थिति में यह सवाल उठना प्रासंगिक हो जाता है कि क्या शीर्ष अदालत बिना किसी प्रभाव या देरी के इस मामले में एक न्यायसंगत और त्वरित फैसला दे पाएगी? यह किसी एक नेता की उम्मीदवारी या एक सीट के नुकसान का नहीं है। यह हमारे पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता की परीक्षा है। यदि जनता का इन संस्थाओं से विश्वास डगमगाया, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव कमजोर हो जाएगी।