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न्यायपालिका के आत्मनिरीक्षण का वक्त आ गया है

दिल्ली की एक अदालत ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद की अंतरिम जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि उनके द्वारा दिए गए तर्क तर्कहीन और अनुचित हैं। खालिद ने अपनी मां की सर्जरी और अपने दिवंगत चाचा के अंतिम संस्कारों व रस्मों में शामिल होने के लिए 15 दिनों की अंतरिम रिहाई की मांग की थी।

गौरतलब है कि यह सामाजिक कार्यकर्ता पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं। अदालत ने इस बात पर गौर तक नहीं किया कि बिना किसी जांच के वह कितने दिनों से जेल में बंद है। उमर खालिद पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के दंगों के सिलसिले में साजिश रचने का आरोप है। ये दंगे नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुए थे।

इस हिंसा में कम से कम 53 लोगों की जान चली गई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस पूरी साजिश के मामले में दिल्ली पुलिस ने कुल 18 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें से अब तक केवल 11 लोगों को ही जमानत मिल सकी है। बीते महीने, सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने खुद को जमानत न दिए जाने के फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की थी। उस समय अदालत ने कहा था कि खालिद के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही मानने के लिए पर्याप्त और व्यावहारिक आधार मौजूद हैं।

पुनर्विचार याचिका और उसके साथ संलग्न दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद, हमें 5 जनवरी, 2026 के फैसले की समीक्षा करने का कोई ठोस आधार या कारण नहीं मिला है। तदनुसार, इस समीक्षा याचिका को खारिज किया जाता है। हालांकि, इस घटनाक्रम में एक बड़ा यू-टर्न तब देखने को मिला जब देश की शीर्ष अदालत ने उमर खालिद और शारजील इमाम को जमानत न देने के अपने ही हालिया फैसले पर गंभीर आपत्ति और चिंता व्यक्त की।

कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में भी जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद का सिद्धांत लागू होता है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि उमर खालिद और शारजील इमाम की जमानत खारिज करने वाला पिछला फैसला, सुप्रीम कोर्ट की ही एक बड़ी पीठ द्वारा यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब के ऐतिहासिक मामले में स्थापित किए गए कानूनी सिद्धांतों को कमजोर करता हुआ प्रतीत होता है। मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने सख्त लहजे में कहा,

कोई भी अदालत पहले से तय और बाध्यकारी कानूनी मिसालों को न तो कमजोर कर सकती है, न ही उनसे बचकर निकल सकती है और न ही उनकी अनदेखी कर सकती है। जस्टिस भुइयां ने आगे जोड़ा कि जिन दो न्यायाधीशों ने खालिद की जमानत खारिज की थी, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों वाली पीठ के उस अनिवार्य फैसले की अनदेखी की, जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि जमानत व्यक्ति का अधिकार (नियम) है और जेल भेजना केवल विशेष परिस्थितियों (अपवाद) में होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की यह हालिया टिप्पणी भारत के आपराधिक न्यायशास्त्र और नागरिक स्वतंत्रता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यूएपीए की कठोरता और मानवाधिकारों में संतुलन: आमतौर पर यूएपीए जैसे सख्त कानूनों के तहत जमानत मिलना बेहद मुश्किल होता है, क्योंकि इसकी धारा 43डी(5) अदालत को तब तक जमानत देने से रोकती है जब तक कि प्रथम दृष्टया आरोप झूठे न लगें। लेकिन शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि कोई भी कानून नागरिकों के मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से बड़ा नहीं हो सकता।

अदालतों के लिए कड़ा संदेश: जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुइयां की पीठ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि निचली अदालतों या समान पीठों को उच्च या बड़ी पीठों के फैसलों का सम्मान करना ही होगा। कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी करके किसी को लंबे समय तक बिना दोषसिद्धि के जेल में नहीं रखा जा सकता।

उमर खालिद मामले में दिल्ली की अदालत द्वारा अंतरिम जमानत याचिका खारिज करना जहां एक तरफ कानूनी प्रक्रियाओं और जांच एजेंसियों के दावों को दिखाता है, वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी न्यायपालिका के भीतर चल रहे वैचारिक मंथन को उजागर करती है। शीर्ष अदालत का यह रुख यह उम्मीद जगाता है कि आने वाले समय में कड़े कानूनों के तहत बंद आरोपियों के मामलों को भी अधिक मानवीय और संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाएगा, ताकि न्याय की मूल आत्मा—जमानत नियम है, जेल अपवाद—जीवित रह सके। अब उमर खालिद मामले की जांच अनंतकाल तक चलती रही तो क्या वह जेल में ही सड़ता रहेगा, यह सवाल न्यायपालिका के समक्ष खड़ा है।